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सामाजिक समरसता की दिशा में संघ का राष्ट्रव्यापी कार्य — प्रतिनिधि सभा प्रतिवेदन 2024-25 के आलोक में


सामाजिक समरसता की दिशा में संघ का राष्ट्रव्यापी कार्य — प्रतिनिधि सभा प्रतिवेदन 2024-25 के आलोक में

(संघ की सामाजिक दृष्टि और समरसता अभियान की गूंज)

“समाज है आराध्य हमारा – समरसता है संस्कार हमारी सेवा साधना।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रतिनिधि सभा 2024-25 में प्रस्तुत प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि सामाजिक समरसता केवल एक विचार नहीं, बल्कि संघ के लिए एक सक्रिय राष्ट्र निर्माण की साधना है। यह वर्ष भर के विविध आयामों में संपन्न कार्यों से स्पष्ट होता है कि जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर समाज को एकात्म करने का व्यापक प्रयास संघ के हर स्तर पर जारी है।




प्रशिक्षण वर्ग: विचार से व्यवहार की ओर

प्रांत आयाम प्रमुखों के प्रशिक्षण वर्ग – श्रीशैलम, मेरठ और दिल्ली में सम्पन्न

367 कार्यकर्ता (बंधु-भगिनी) सहभागिता — विचारशील नेतृत्व के निर्माण की दिशा में एक ठोस पहल





जननेता और समाज प्रमुख संपर्क: सज्जन शक्ति की जागृति

आंध्र प्रदेश, तेलंगाणा, गुजरात, सौराष्ट्र, छत्तीसगढ़ में समाज प्रमुखों से संवाद और समरसता साहित्य का वितरण

कुल 6967 समाज प्रमुखों से संपर्क, जिसमें समरसता साहित्य भेंट किया गया

परिवार सम्मेलन, पारिवारिक गोष्ठी और मंगल संवाद में क्रमशः 724, 112 और 74 व्यक्तियों की सहभागिता





साहित्य निर्मिती एवं जनजागरण

समरसता के प्रेरणादायक व्यक्तित्वों जैसे सद्गुरु मलयाला स्वामी (आंध्र), भगवान वाल्मीकि (पंजाब), सामाजिक समरसता (गुजरात) पर साहित्य निर्माण

तेलंगाणा में 50,000 घरों में समरसता दिनदर्शिका का वितरण





संविधान जागरण: चेतना की नई पहल

कोकण, पश्चिम महाराष्ट्र, देवगिरी, विदर्भ, दक्षिण बिहार में संविधान विषयक व्याख्यान, अभ्यास वर्ग, दौड़ जैसे कार्यक्रम

उद्देश्य – नागरिक कर्तव्य और समता भावना को सामाजिक चेतना में स्थान देना





समाज परिवर्तन हेतु 1048 क्षेत्र चिन्हित

मंदिर प्रवेश, दो पंगत, जातिगत भेद मिटाने के प्रयास

अनेक स्थानों पर सफल कार्य निष्पादन और समरसता की नई मिसालें





सफाई कर्मचारी सेवा कार्य: सम्मान और सहभागिता का संदेश

260 स्थानों पर सेवा कार्य – अल्पाहार, प्रशिक्षण, साहित्य वितरण, बस्ती सेवा

मालवा प्रांत में 766 परिवारों में बंधु-संत सहभाग, 3000 सेवा प्रदाताओं के हाथ से ध्वज वंदन





संत सम्मेलन: आध्यात्मिक शक्ति का समरसता में योगदान

10 प्रांतों में संत सम्मेलन – संतों के विचारों से समाज में समता का संदेश

उत्तराखंड, मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, मेरठ, दक्षिण तमिलनाडु, तेलंगाणा आदि में आयोजन





महिला सम्मेलन: समरसता में मातृशक्ति की भागीदारी

मालवा, छत्तीसगढ़, कानपुर, अवध, उत्तर कर्नाटक, दक्षिण बिहार में महिला सम्मेलन

समाज की जागृति में महिलाओं की सक्रिय भूमिका को बल मिला





मंदिर केंद्रित कार्य: समाज के सभी वर्गों का समावेश

छत्तीसगढ़, पंजाब, दिल्ली में मंदिर कार्य समितियों में सभी वर्गों की सहभागिता

भगवान वाल्मीकि और संत शिरोमणि रविदास जी की प्रतिमाएं स्थापित

300+ रामलीलाओं में पहले दिन वाल्मीकि पूजन की परंपरा शुरू





चंबल, मुरैना और ग्राम समरसता: कार्य की गहराई

683 ग्रामों में एक मंदिर, एक श्मशान योजना सफल

समरसता बैठकें, संत सहभाग, जातिगत कार्यक्रमों में सहभागिता का क्रम

5 जनवरी 2025 को सामाजिक सद्भाव सम्मेलन – 114 जातियों से 1,178 समाजों की सहभागिता





हिमाचल, काशी, महाराष्ट्र और तेलंगाणा: समरसता की प्रेरक कहानियाँ

हिमाचल (बिलासपुर): “समरसता में साधु-संतों की भूमिका” पर संगोष्ठी – 157 संत सहभागी

काशी (खुदौली शाखा): अनुसूचित जाति परिवार में त्रयोदशी भोज, गीता जयंती में 500 सहभागी, सह-भोज में 400 परिवारों का योगदान

तेलंगाणा: गोदावरी तट पर समरसता आरती

महाराष्ट्र: गणेश उत्सव में समरसता आरती की प्रेरणा





निष्कर्ष : समरसता ही राष्ट्र की आत्मा है

प्रतिनिधि सभा का यह प्रतिवेदन स्पष्ट करता है कि समाज की एकता, समरसता और स्वाभिमान की पुनः स्थापना ही संघ का मूल लक्ष्य है। जाति-भेद की दीवारें टूट रही हैं, समरसता के दीप जल रहे हैं और संगठन के माध्यम से समाज आत्मनिर्भर और संगठित हो रहा है।

“यह केवल एक योजना नहीं – यह एक सामाजिक पुनर्रचना की यात्रा है।”

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