प्रचारक जीवन का प्रारम्भ
दिनांक 22 मार्च 1942 को संघ के प्रचारक का चुनौती भरा दायित्व स्वीकार कर आप सुदूर केरल प्रान्त में संघ का विस्तार करने के लिए ‘‘कालीकट’’ (Kozhikode) पहुंचे। 1942 से 1945 तक रा. स्व. संघ प्रचारक के नाते यशस्वी कार्य खड़ा करने के साथ ही, 1945 से 1947 तक, कलकत्ता में, संघ के प्रचारक के नाते, तथा 1948 से 49 तक बंगाल.असम प्रान्त के प्रान्त प्रचारक का दायित्व सम्पादन किया। इस समय राष्ट्रीय परिदृष्य में,भारत विभाजन, तथा पूज्य महात्मा जी की हत्या से उत्पन्न परिस्थितियों का बहाना बनाकर संघ पर आरोपित प्रतिबंध और देशभक्तों द्वारा अन्यायकारी प्रतिबंध के विरूद्ध देशव्यापी सत्याग्रह, इसी बीच जून माह में,सरकार के साथ बातचीत का घटनाक्रम तेजी से घटा और श्री वेंकटराम शास्त्री की मध्यस्थता में, सरकार ने संघ पर लगाया गया प्रतिबंध वापिस लिया। ऐसे चुनौती पूर्ण समय में, श्रद्धेय दत्तोपंत जी को बंगाल से वापिस नागपुर बुला लिया गया।
विद्यार्थी परिषद् की स्थापना
9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की औपचारिक घोषणा हुई। और, दत्तोपंत जी को,विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य तथा नागपुर विदर्भ के प्रदेशाध्यक्ष के नाते जिम्मेदारी दी गई। श्री दत्ताजी डिडोलकर को महामंत्री तथा बबनराव पाठक को संगठन मंत्री का दायित्व दिया गया।
विद्यार्थी परिषद् ने नागपुर-विदर्भ में सरकार के साथ अच्छे संबंध स्थापित किये। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, अर्थमंत्री, राज्यपाल आदि सभी को अपने उत्सवों में बुलाने का क्रम विद्यार्थी परिषद् ने जारी रखा। अन्नमंत्री गोपाल राव काले के नेतृत्व में जो अधिक अन्न उपजाओ अभीयान चल रहा था, विद्यार्थी परिषद् ने पूरी शक्ती के साथ उसका समर्थन किया पूरे प्रदेश में जन-जागरण की दृष्टी से कार्यक्रम हुये। बडोदा, फेटरी और गुमथला में सरकारी योजना के अन्तर्गत कम्पोस्ट खाद तैयार करने के यशस्वी प्रयोग भी हुये। प्रादेशिक सरकार ने भी एक डॉक्युमेन्ट्री के द्वारा विद्यार्थी परिषद् के इन प्रयासों को उचित प्रसिद्धी दी।
श्रद्धेय दत्तोपंत जी के शब्दों में, “हमारी कार्यकारिणी ने कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर सुयोग्य व्यक्तियों के भाषण विद्यार्थीयों के लिये करवाने का विचार किया। नियमित अभ्यासक्रम में आने वाले महत्वपूर्ण विषयों पर सुयोग्य प्राध्यापकों के भाषण करवाये गये। अभ्यासक्रम के बाहर भी कुछ महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी विद्यार्थीयों को हो यह विचार कार्यकारिणी ने किया। इस हेतु जो विषय चुने गये उनमें एक था “मध्यप्रदेश मजदूर आन्दोलन का इतिहास” इस विषय के संबंध में प्रादेशिक इंटक के अध्यक्ष श्री पी. वाय. देशपाण्डे इनके साथ मैं बात करूं यह तय हुआ। तद्नुसार मैं उनके पास गया, वैसे उनके साथ हमारा पारिवारिक संबंध था। आज हरिजन सेवक संघ की अध्यक्षा और राज्यसभा सदस्य कुमारी निर्मला देशपांडे के वे पिताजी थे। मैंने अपना विषय उनके सामने, उन्होंने गुस्से में आकर कहा कि, “यह सारी फिजूल बातें रहने दो, आज देश के मजदूर क्षैत्र पर सबसे बड़ा संकट कम्युनिस्टों का है। वे मॉस्को के पिट्ठू है। मजदूर क्षैत्र में उनके प्रभाव को रोकना आवश्यक है। इस दृष्टी से तुम स्वयं इंटक में आ जाओ, और यहाँ कुछ जिम्मेदारी का वहन करो।“ मैंने कहा कि इस विषय में मैं गम्भीरता से सोचूगाँ।

वापिस आने के बाद परम पूजनीय श्रीगुरुजी को यह बात बताई। मैं तो व्यक्तिगत रूप से इंटक में जाना पसंद नहीं करता था। क्योंकि इंटक के सभी नेता संघ को गांधी हत्यारा, ऐसा कहते हुये निन्दा करते थे। ऐसे लोगों में जाकर मैं कैसे काम कर सकूंगा ?
किन्तु श्रीगुरुजी की प्रतिक्रिया देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि श्री पी. वाय. देशपांडे का निमंत्रण यह हमारे लिये सुवर्ण अवसर है। मैं भी चाहता हूं कि अपने पास ऐसे भी कार्यकर्ता रहे जो मजदूर क्षैत्र में काम करने की पद्धती को जानते हो। इसलिये इस निमंत्रण को तुम स्वीकार कर लो और विद्यार्थी परिषद् के साथ ही इंटक में काम करो।
कुछ दिनों के बाद श्री देशपांडे जी ने मुझे बताया, की मुझे निमंत्रण देने का सुझाव गृहमंत्री श्री द्वारकाप्रसाद जी मिश्र का था। मेरे सभी कार्यों पर उनकी दृष्टी थी। इंटक में उस समय दो गुट हो गये थे। एक मिनिस्टेरियल और दूसरा एंटी मिनिस्टेरियल, एंटी मिनिस्टेरियल गुट के प्रमुख डॉ. डेकाटे थे। वे कुशल संगठक थे।उन्होंने इंटक में अपना प्रभाव बढ़ाया था। उनकी तुलना में दूसरा कोई भी कुशल संगठक मिनिस्टेरियल गुट में नहीं था। इस कारण मिनिस्टेरियल गुट कमजोर हो गया था। इसके लिये क्या किया जाये यह चर्चा श्री देशपांडे जी और द्वारकाप्रसाद जी इनमे हुई। इस चर्चा में द्वारकाप्रसाद जी ने कहा कि, देशपांडे जी मुझे इंटक में निमंत्रित करे। उन्होंने यह भी विश्वास प्रकट किया कि यह व्यक्ति डॉ. डेकाटे का मुकाबला सफलतापूर्वक कर सकेगा। इस पार्श्वभूमी पर देशपांडे जी ने मुझे आमंत्रित किया।“ (स्मृतिगंध पृष्ठ संख्या – 6)
–डॉ रणजीत सिंह जोधपुर
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