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भारत ने कश्मीर से संयुक्त राष्ट्र को बाहर निकाला: शिमला समझौते का अंत, UN की भूमिका खत्म

भारत सरकार ने कश्मीर में 74 वर्षों से मौजूद संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) को देश से बाहर निकालने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। यह समूह 1948 से कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम की निगरानी के लिए तैनात था, लेकिन भारत लंबे समय से इसे अपनी संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानता रहा है। मोदी सरकार ने अब UNMOGIP के सभी सदस्यों के वीजा रद्द कर दिए हैं और उन्हें दस दिनों के भीतर भारत छोड़ने का निर्देश दिया है।

1972 के शिमला समझौते के बाद से भारत का रुख स्पष्ट रहा है कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है और इसमें किसी तीसरे पक्ष, यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र की भी कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। शिमला समझौते में भारत और पाकिस्तान ने साफ तौर पर यह तय किया था कि वे अपने विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाएंगे और युद्धविराम रेखा (अब नियंत्रण रेखा) की निगरानी भी आपसी सहमति से होगी। इसके बावजूद UNMOGIP कश्मीर में बना रहा, जबकि भारत ने 2014 में ही औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र से कश्मीर में अपना अभियान बंद करने को कह दिया था।

भारत का तर्क है कि जम्मू-कश्मीर पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है और पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के चलते अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था या तीसरे पक्ष की दखलंदाजी स्वीकार्य नहीं है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 47 को भी नकार दिया था, जिसमें जनमत संग्रह की बात कही गई थी, क्योंकि पाकिस्तान ने कभी भी अपनी सेना और नागरिकों को कश्मीर से नहीं हटाया, जो जनमत संग्रह की पहली शर्त थी।

पाकिस्तान और कुछ पश्चिमी देशों ने भारत के इस कदम पर आपत्ति जताई है, लेकिन भारत ने अपने रुख पर अडिग रहते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब कश्मीर पर कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होगा। यह फैसला भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत और आत्मविश्वास का भी प्रतीक है, जिससे पाकिस्तान के पास अब कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोई ठोस आधार नहीं बचा है।

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