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इस बार युद्ध विराम अभी नहीं करना चाहिए था :-कुलदीप सिंह



पर शुरू करने के बाद हमें वैश्विक राजनीति में वास्तविक स्थिति का पता चला|
अटल जी कहा करते थे- पुराना मित्र नए मित्र से हमेशा अच्छा होता है हमें अपने परंपरागत मित्र को नहीं खोना चाहिए|
फॉरेन पॉलिसी पर 2014 के बाद किए गए कामों की समीक्षा होनी चाहिए|
इमर्जिंग चीन और जॉर्ज बुश के बाद कमजोर होते अमेरिका जो कमजोर बाइडेन और उतावले ट्रंप के बाद NATO में भी अपनी भूमिका कमजोर कर चूका है|
हेनरी किसिंजर ने कहा था-जो हमारे साथ नहीं वो हमारा शत्रु है| थोड़ा लम्बा चलते तो यह और स्पष्ट होता |
जैसे हम “कूटनीतिक मध्यम मार्ग”अपनाते हैं ( इसराइल -फिलिस्तीन और यूक्रेन-रसिया ) वैसा हमारे साथ भी रहा| अमेरिका कभी किसी का मित्र नहीं हो सकता, उसे जब तक जिसकी जरूरत है वह तब तक उसके साथ है, हमें भी उसका उपयोग करना ही सीखना होगा|
उदारवादी सऊदी अरब और कट्टरवादी तुर्की दोनों अपने हितों के परिपेक्ष में मुस्लिम देशों का नेतृत्व करना चाहते हैं, तुर्की खुलकर पाकिस्तान के साथ आया और सऊदी अरब न्यूट्रल होकर|
हमारा बड़ा बाजार, हमारी आवश्यकतायें और उपभोक्ता होना, उससे हम बड़े व्यापारी को नजदीक ला रहे हैं अच्छे दोस्त को नहीं|
किसी को काउंटर करने के लिए किसकी कितनी माननी है और कितना झुकना है राष्ट्रीय हित के संदर्भ में वह तय करना पड़ेगा |
अटल जी ने कहा करते थे- आप मित्र का चयन कर सकते हो पड़ोसी का नहीं|
और आपकी आंतरिक नीतियों का ब्राहय प्रक्षेपण ही आपकी विदेश नीति है|
अशांत पड़ोस में किसी पड़ोसी के साथ इस तरह कंप्रोमाइज होने से अन्य पड़ोसियों और शत्रु के मित्रों के स्वभाव में परिवर्तन होगा|
पिछले युद्धों में भी हमने जो युद्ध में जीता वह टेबल पर खो दिया |( ताशकंद 1966 और शिमला 1972)
इस बार हम टेबल पर भी नहीं आ पाए|
कहीं बाकी पड़ोसी इसे हमारा स्वभाव नहीं समझ ले, क्योंकि उनका समर्थन भी वही कर रहे हैं जो पाकिस्तान को कर रहे हैं, इसलिए जो हम ऑपरेशन सिंदूर में “वार स्ट्रेटजी” के रूप में नहीं कर पाए,वह हमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कठोरता पूर्वक अन्य मौर्चो पर बहुत मजबूती से करनी होगी,
साथ ही पाकिस्तान के साथ अप्रत्यक्ष रूप से आए देशों के स्वभाव को भी समझना होगा, ताकि अन्य पड़ोसी इस तरह की सोच भी नहीं पाए |
हम युद्धों का घरों में बैठकर आकलन कर रहे थे और वहां बहुत सारे लोग प्रेशर कुकर बने हुए थे,
सैन्य मोर्चो पर अपने जीवन की परवाह किए बिना
डटे हुए थे|

आजादी के बाद से अब तक के समय में हमारी फॉरेन पॉलिसी सबसे मजबूत स्थिति में है,
हमने बहुत कुछ वह प्राप्त किया है जो पहले सोचा भी नहीं जा सकता था, शायद इसीलिए अपेक्षाएं ज्यादा बढ़ गई थी|

मैं मोदी सरकार का समर्थक हूं विरोधी नहीं, आलोचना और समीक्षा मेरा अधिकार और कर्तव्य है|
एस जयशंकर मेरे अब तक के पसंदीदा और प्रभावी विदेश सचिव में है,इसलिए कोई कांग्रेस,बीजेपी,सपा,बसपा, यह मोर्चा वह मोर्चा करके जबरदस्ती ज्ञान देने की कोशिश ना करें | ज्यादा उतावलापन आए तो ट्रंप की तरह X पर लिख दे |
विशेष: यह टिप्पणी फॉरेन पॉलिसी की समीक्षा और सुधार के मध्य नजर है,


श्री कुलदीप सिंह (अतिथि लेखक)

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