डॉ. सैफुद्दीन जिलानी : ”श्रीगुरुजी न केवल इस देश के सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, अपितु वे देश के भाग्य-विधाता हैं। हिटलर से लेकर नास्सर तक विश्व की बड़ी-बड़ी हस्तियों से मैं मिल चुका हूँ। किन्तु श्रीगुरुजी जैसा प्रसन्नचित, आत्मविश्वासी और प्रभावी व्यक्तित्व अभी तक मेरे देखने में नहीं आया। ईमानदारी के साथ मुझे लगता है कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या को सुलझाने के विषय में एकमात्र श्रीगुरुजी ही हैं, जो यथोचित मार्गदर्शन कर सकते हैं।”
जिलानी जाने माने पत्रकार थे, हिन्दू-मुस्लिम समस्या पर श्रीगुरुजी के विचार जानने के लिए उन्होंने गुरूजी से जो साक्षात्कार लिया था वह आज की परिस्थिति में भी मार्गदर्शक सिध्द हो सकता है। पढ़िए यह साक्षात्कार जो 1971 में कोलकाता में लिया गया था। गुरूजी की दृष्टि एवं सोच कितनी उन्नत और दूरगामी थी , यह इस साक्षात्कार को पढ़कर जानिए जो आज आधे दशक के बाद भी सामायिक है और क्लिष्ट मुद्दों का सटीक हल देता है ।
प्रश्न 1 : देश के समक्ष आज जो संकट मुँह बाए खड़े हैं, उन्हें देखते हुए हिन्दू-मुस्लिम समस्या का कोई निश्चित हल ढूँढ़ना, क्या आपको आवश्यक प्रतीत नहीं होता?
उत्तर : देश का विचार करते समय मैं हिन्दू और मुसलमान इस स्वरूप में विचार नहीं करता। परन्तु इस प्रश्न की ओर लोग आज कल सभी लोग राजनीतिक दृष्टिकोण से ही विचार करते दिखाई देते हैं। हर कोई राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर व्यक्तिगत अथवा जातिगत स्वार्थ सिध्द करने में लिप्त है। इस परिस्थिति को समाप्त करने का केवल एक ही उपाय है। वह है राजनीति की ओर देशहित, और केवल देशहित की ही दृष्टि से देखना। उस स्थिति में, वर्तमान सभी समस्याएँ देखते ही देखते हल हो जायेंगी।
(वे राजनीतिक शुद्धता की परवाह नहीं करते; सच्चाई को सच्चाई के रूप में कहने का साहस रखते थे)

गुरूजी कहते चले जा रहे थे …….हाल ही में मैं दिल्ली गया था। उस समय अनेक लोग मुझ से मिलने आये थे। उनमें भारतीय क्रान्ति दल, संगठन कांग्रेस आदि दलों के लोग भी थे। संघ को हमने प्रत्यक्ष राजनीति से अलग रखा है। परन्तु मेरे कुछ पुराने मित्र जनसंघ में होने के कारण, कुछ मामलों में मैं मध्यस्थता करूं, इस हेतु वे मुझसे मिलने आये थे। उनसे मैंने एक सामान्य-सा प्रश्न पूछा, ‘आप लोग हमेशा अपने दल का और आपके दल के हाथ में सत्ता किस तरह आये इसी का विचार किया करते हो। परन्तु दलीय निष्ठा, दलीय हितों का विचार करते समय, क्या आप सम्पूर्ण देश के हितों का भी कभी विचार करते हो? इस सामान्य से प्रश्न का ‘हाँ’ में उत्तर देने के लिए कोई सामने नहीं आया। समग्र देश के हितों का विचार सचमुच उनके सामने होता, तो वे वैसा साफ-साफ कह सकते थे। किन्तु उन्होंने नहीं कहा। इसका अर्थ स्पष्ट है कि कोई भी दल, समग्र देश का विचार नहीं करता। मैं समग्र देश का विचार करता हूँ। इसलिए मैं हिन्दुओं के लिये कार्य करता हूँ। परन्तु कल यदि हिन्दू भी देश के हितों के विरुध्द जाने लगे, तो उनमें मेरी कौन-सी रुचि रह जायेगी?
(बात बात पर मुसलमानो द्वारा विशेषाधिकारों की मांग पर )
रही मुसलमानों की बात। मैं यह समझ सकता हूँ कि अन्य लोगों की तरह उनकी भी न्यायोचित माँगे पूरी की जानी चाहिए। परन्तु जब चाहे तब विभिन्न सहूलियतों और विशेषाधिकारों की माँगे करते रहना कतई न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। मैंने सुना है कि प्रत्येक प्रदेश में एक छोटे पाकिस्तान की माँग उठाई गई, जैसा कि प्रकाशित हुआ है। एक मुस्लिम संगठन के अध्यक्ष ने तो लाल किले पर चांद वाला हरे रंग का पाक झण्डा लहराने की बात की। परन्तु भारतीय व सच्चे मुसलमानों के द्वारा इसका खण्डन भी नहीं किया गया है। ऐसी बातों से समग्र देश का विचार करने वालों को संतप्त होना आवश्यक है।
(उर्दू मुसलमानों की धर्म भाषा नहीं है )
उर्दू के आग्रह का ही विचार करें। पचास वर्षों के पूर्व तक विभिन्न प्रान्तों के मुसलमान अपने-अपने प्रान्तों की भाषाएँ बोला करते, उन्हीं भाषाओं में शिक्षा ग्रहण किया करते थे। उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि उनके धर्म की कोई अलग भाषा है। उर्दू मुसलमानों की धर्म-भाषा नहीं है। मुगलों के समय में एक संकर भाषा के रूप में वह उत्पन्न हुई। इस्लाम के साथ उसका रत्ती भर का भी संबंध नहीं है। पवित्र कुरान अरबी में लिखा है। अत: मुसलमानों की अगर कोई धर्म-भाषा हो तो वह अरबी ही होगी। ऐसा होते हुए भी, आज उर्दू का इतना आग्रह क्यों? इसका कारण यह है कि इस भाषा के सहारे वे मुसलमानों को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करना चाहते हैं। यह संभावना नहीं तो एक निश्चित तथ्य है कि इस तरह की राजनीतिक शक्ति देशहितों के विरुध्द की जायेगी।
(मुसलमानो के राष्ट्रपुरुष श्री राम क्यों नहीं हो सकते हैं !)
कुछ मुसलमान कहते हैं कि उनका राष्ट्र-पुरुष रुस्तम है। सच पूछा जाए, तो मुसलमानों का रुस्तम से क्या संबंधा? रुस्तम तो इस्लाम के उदय पूर्व ही हुआ था। वह कैसे उनका राष्ट्र-पुरुष हो सकता है? और फिर प्रभु रामचन्द्रजी क्यों नहीं हो सकते? मैं पूछता हूँ कि आप यह इतिहास स्वीकार क्यों नहीं करते?
पाकिस्तान ने पाणिनि की पांच हजारवीं जयंती मनाई! इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि जो हिस्सा पाकिस्तान के नाम से पहचाना जाता है, वहीं पाणिनि का जन्म हुआ था। यदि पाकिस्तान के लोग गर्व के साथ यह कह सकते हैं कि पाणिनि उनके पूर्वजों में से एक है, तो फिर भारत के ‘हिन्दु मुसलमान’ भी – मैं उन्हें ‘हिन्दु मुसलमान’ कहता हूँ – पाणिनि, व्यास, वाल्मीकि, राम, कृष्ण आदि को अभिमानपूर्वक अपने महान पूर्वज क्यों नहीं मानते?
हिन्दुओं में से ऐसे अनेक लोग हैं, जो राम, कृष्ण आदि को ईश्वर के अवतार नहीं मानते। फिर भी वे उन्हें महापुरुष मानते हैं, अनुकरणीय मानते हैं। इसलिए मुसलमान भी यदि उन्हें अवतारी पुरुष न मानें, तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला है। परन्तु क्या उन्हें राष्ट्र-पुरुष नहीं माना जाना चाहिए? हमारे धर्म और तत्वज्ञान की शिक्षा के अनुसार हिन्दू और मुसलमान समान ही हैं। ऐसी बात नहीं है कि ईश्वरी सत्य का साक्षात्कार केवल हिन्दू ही कर सकता है। अपने धर्ममत के अनुसार कोई भी साक्षात्कार कर सकता है।
श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य का ही उदाहरण लें। यह उदाहरण वर्तमान शंकराचार्य के गुरु का है। एक अमेरिकी व्यक्ति उनके पास आया और उनसे प्रार्थना की कि उसे हिन्दू बना लिया जाए। इस पर शंकराचार्य जी ने उससे पूछा कि वह हिन्दू क्यों बनना चाहता है? उसने उत्तर दिया, कि ईसाई धर्म से उसे शांति प्राप्त नहीं हुई है। आध्यात्मिक तृष्णा अभी अतृप्त ही है।
इस पर शंकराचार्य जी ने उससे कहा, ‘क्या तुमने सचमुच पहले ईसाई धर्म का प्रामाणिकतापूर्वक पालन किया है? तुम यदि इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके होगे कि ईसाई धर्म का पालन करने के बाद भी तुम्हें शांति नहीं मिली, तो मेरे पास अवश्य आओ।’
हमारा दृष्टिकोण इस तरह का है। हमारा धर्म, धर्म -परिवर्तन न कराने वाल धर्म है। धर्मान्तरण तो प्राय: राजनीतिक अथवा अन्य हेतु से कराये जाते हैं। इस तरह का धर्म-परिवर्तन हमें स्वीकार नहीं है। हम कहते हैं – ‘यह सत्य है! तुम्हें जँचता हो तो स्वीकार करो अन्यथा छोड़ दो।’
(हम सबके पूर्वज एक ही हैं )
दक्षिण की यात्रा के दौरान मदुराई में कुछ लोग मुझसे मिलने के लिये आये। मुस्लिम-समस्या पर वे मुझसे चर्चा करना चाहते थे। मैंने उनसे कहा – ”आप लोग मुझसे मिलने आये, मुझे बड़ा आनन्द हुआ। मुसलमानों के विषय में मेरा दृष्टिकोण उन्होंने जानना चाहा तो मैं उनसे बोला, ” यह बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं और हम सब उनके वंशज हैं। आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें। परन्तु राष्ट्र के मामले में सबको एक होना चाहिए। राष्ट्रहित के लिए बाधाक सिध्द होने वाले अधिकारों और सहूलियतों की माँग बन्द होनी चाहिए।

(हिन्दू आपस में एक होकर रहे , अथवा सर्वनाश होगा )
हम हिन्दू हैं इसलिए हम विशेष सहूलियतों के अधिकारों की कभी बात नहीं करते। ऐसी स्थिति में कुछ लोग यदि कहने लगें कि ‘हमें अलग होना है’, ‘हमें अलग प्रदेश चाहिए’ तो यह कतई सहन नहीं होगा।
ऐसी बात नहीं कि यह प्रश्न केवल हिन्दू और मुसलमानों के बीच ही है। यह समस्या तो हिन्दुओं के बीच भी है। जैसे हिन्दू-समाज में जैन लोग हैं, तथाकथित अनुसूचित जातियाँ हैं। अनुसूचित जातियों में कुछ लोगों ने डा. अम्बेडकर के अनुयायी बन कर बौध्द धर्म ग्रहण किया। अब वे कहते हैं – ‘हम अलग हैं।’ अपने देश में अल्पसंख्यकों को कुछ विशेष राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, इसलिए प्रत्येक गुट स्वयं को अल्पसंख्यक बताने का प्रयास कर रहा है तथा उसके आधार पर कुछ विशेष अधिकार और सहूलियतें माँग रहा है। इससे अपने देश के अनेक टुकड़े हो जायेंगे और सर्वनाश होगा। हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। अलगाव का अर्थ है देश का विभाजन और विभाजन का परिणाम होगा आत्मघात! सर्वनाश!!
जब प्रत्येक बात का विचार राजनीतिक स्वार्थ की दृष्टि से ही करने लगते हैं, तो अनेक भीषण समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। किन्तु इस स्वार्थ को अलग रखते ही अपना देश एक संघ बन सकता है। फिर हम सम्पूर्ण विश्व की चुनौती का सामना कर सकते हैं।
इस प्रकार के उत्तर की मैंने कभी अपेक्षा नहीं की थी। श्रीगुरुजी के व्यापक दृष्टिकोण को देख मैं विस्मय से विमुग्ध हो उठा। मेरे द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों में, श्रीगुरुजी ने देश की सभी समस्याओं का समावेश किया। साथ ही किया उसकी दुर्बलताओं का अचूक निर्देश। भारतीय मुसलमानों के बारे में श्रीगुरुजी ने ठीक-ठीक निदान किया और उस पर सुझाया अपना रामबाण उपाय भी।
प्रश्न 2 : भौतिकवाद और विशेषत: मार्क्सवाद से अपने देश के लिए खतरा पैदा हो गया है। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास रखते हैं। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि दोनों मिलकर इस संकट का मुकाबला कर सकते हैं?
उत्तर : यही प्रश्न कश्मीर के एक सज्जन ने मुझसे किया था। उनका नाम सम्भवत: जागिर अली है। अलीगढ़ में मेरे एक मित्र अधिवक्ता श्री मिश्रीलाल के निवास स्थान पर वे मुझसे मिले। उन्होंने मुझसे कहा, ”नास्तिकता और मार्क्सवाद हम सभी पर अतिक्रमण हेतु प्रयत्नशील है। अत: ईश्वर पर विश्वास रखने वाले हम सभी को चाहिए कि हम सामूहिक रूप में इस खतरे का मुकाबला करें।”
मैंने कहा, ”मैं आपसे सहमत हूँ। परन्तु कठिनाई यह है कि हम सबने मानो ईश्वर की प्रतिमा के टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं और हरेक ने एक-एक टुकड़ा उठा लिया है। आप ईश्वर की ओर अलग दृष्टि से देखते हैं, ईसाई अलग दृष्टि से देखते हैं। बौध्द लोग तो कहते हैं कि ईश्वर तो है ही नहीं, जो कुछ है वह निर्वाण ही है, जैन लोग कहते हैं कि सब कुछ शून्याकार ही है। हममें से अनेक लोग राम, कृष्ण, शिव आदि के रूप में ईश्वर की उपासना करते हैं। इन सबको आप यह किस तरह कह सकेंगे कि एक ही सर्वमान्य ईश्वर को माना जाये। इसके लिए आपके पास क्या कोई उपाय है?”
मुझसे चर्चा करने वाले सज्जन सूफी थे। मेरी यह धारणा थी कि सूफी पंथी ईश्वरवादी और विचारशील हुआ करते हैं। मेरे प्रश्न का उन्होंने जो उत्तर दिया, उसे सुनकर आप आश्चर्यचकित हो जाएँगे; क्योंकि उन्होंने कहा, ‘तो फिर आप सब लोग इस्लाम ही क्यों नहीं स्वीकार कर लेते?”
मैंने कहा, ”फिर तो कुछ लोग कहेंगे कि ईसाई क्यों नहीं बन जाते? मेरे धर्म के प्रति मुझमें निष्ठा है इसलिए मैं यदि आपसे कहूँ कि आप हिन्दू क्यों नहीं बन जाते, तो? यानी समस्या जैसी की वैसी रह गयी। वह कभी हल नहीं होगी।”
इस पर उन्होंने मुझसे पूछा, ”तो फिर इस पर आपकी क्या राय है?”
मैं बोला, ”सभी अपने-अपने धर्म का पालन करें। एक ऐसा सर्वभूत तत्वज्ञान है, जो केवल हिन्दुओं का या केवल मुसलमानों का ही हो ऐसी बात नहीं। इस तत्वज्ञान को आप अद्वैत कहें या और कुछ। यह तत्वज्ञान कहता है कि एक एकमेवाद्वितीय शक्ति है। वही सत्य है, वही आनन्द है, वही सृजन, रक्षण और संहारकर्ता है। अपनी ईश्वर की कल्पना उसी सत्य का सीमित रूप है। अन्तिम समय का यह मूलभूत रूप किसी धर्म विशेष का नहीं अपितु सर्वमान्य है। तो यही रूप हम सबको एकत्रित कर सकता है। सभी धर्म वस्तुत: ईश्वर की ही ओर उन्मुख करते हैं। अत: यह सत्य आप क्यों स्वीकार नहीं करते कि मुसलमान, ईसाई और हिन्दुओं का परमात्मा एक ही है और हम सब उसके भक्त हैं। एक सूफी के रूप में तो आपको इसे स्वीकार करना चाहिए।”
इस पर उन जागिर अली महोदय के पास कोई उत्तर नहीं था। दुर्भाग्य उनसे हमारी बातचीत यहीं समाप्त हो गयी।

प्रश्न 3 : हिन्दू और मुसलमान के बीच आपसी सद्भाव बहुत है, फिर भी समय-समय पर छोटे-बड़े झगड़े होते ही रहते हैं। इन झगड़ों को मिटाने के लिए आपकी राय में क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर : अपने लेखों में इन झगड़ों का एक कारण आप हमेशा बताते हैं। वह कारण है – गाय। दुर्भाग्य से अपने लोग और राजनीतिक नेता भी इस कारण का विचार नहीं करते। परिणामत: देश के बहुसंख्यकों में कटुता की भावना उत्पन्न होती है। मेरी समझ में नहीं आता कि गोहत्या के विषय में इतना आग्रह क्यों है? इसके लिए कोई कारण दिखाई नहीं देता। इस्लाम धर्म गोहत्या का आदेश नहीं देता। पुराने जमाने में हिन्दुओं को अपमानित करने का वह एक तरीका रहा होगा। अब वह क्यों चलना चाहिए?
इसी प्रकार की अनेक छोटी-बड़ी बातें हैं। आपस के पर्वों-त्यौहारों में हम क्यों सम्मिलित न हों? होलिकोत्सव समाज के सभी स्तरों के लोगों को अत्यन्त उल्लासयुक्त वातावरण में एकत्रित करने वाला त्यौहार है। मान लीजिए कि इस त्यौहार के समय किसी मुस्लिम बन्धु पर कोई रंग उड़ा देता है, तो इतने मात्र से क्या कुरान की आज्ञाओं का उल्लंघन होता है? इन बातों की ओर एक सामाजिक व्यवहार के रूप में देखा जाना चाहिए। मैं आप पर रंग छिड़कूं, आप मुझ पर छिड़कें। हमारे लोग तो कितने ही वर्षों से मोहर्रम के सभी कार्यक्रमों में सम्मिलित होते आ रहे हैं। इतना ही नहीं तो अजमेर के उर्स जैसे कितने ही उत्सवों-त्यौहारों में मुसलमानों के साथ हमारे लोग भी उत्साहपूर्वक सम्मिलित होते हैं।
किन्तु हमारी सत्यनारायण की पूजा में हम यदि कुछ मुसलमान बन्धुओं को आमंत्रित करें तो क्या होगा? आपको विदित होगा कि द्रमुक के लोग अपने मंत्रिमण्डल के एक मुस्लिम मंत्री को रामेश्वर के मंदिर में ले गये। मंदिर के अधिकारियों, पुजारियों और अन्य लोगों ने उक्त मंत्री का यथोचित मान-सम्मान किया किन्तु उसे जब मंदिर का प्रसाद दिया गया, तो उसने वह प्रसाद फेंक दिया। उसने ऐसा क्यों किया? प्रसाद ग्रहण करने मात्र से वह धर्मभ्रष्ट तो होने वाला नहीं था! इसी तरह की छोटी-छोटी बातें हैं। अत: पारस्परिक आदर की भावना उत्पन्न की जानी चाहिए।
हमें जो वृत्ति अर्थप्रेत है, वह सहिष्णुता मात्र नहीं। अन्य लोग जो कुछ करते हैं उसे सहन करना सहिष्णुता है। परन्तु अन्य लोग जो कुछ करते हैं, उसके प्रति आदरभाव रखना सहिष्णुता से ऊँची बात है। इसी वृत्ति, इसी भावना को प्राधान्य दिया जाना चाहिए। हमें सबके विषय में आदर है। यही मानवता के लिए हितकर है। हमारा वाद सहिष्णुतावाद नहीं, अपितु सम्मानवाद है। दूसरों के मतों का आदर करना हम सीखें, तो सहिष्णुता स्वयमेव चली आयेगी।
प्रश्न 4: हिन्दू और मुसलमान के बीच सामंजस्य स्थापित करने के कार्य के लिए आगे आने की योग्यता किसमें है? राजनीतिक नेता, शिक्षा शास्त्री या धार्मिक नेता में?
उत्तर : इस मामले में राजनीतिज्ञ का क्रम सबसे अन्त में लगता है। धार्मिक नेताओं के विषय में भी यही कहना होगा। आज अपने देश में दोनों ही जातियों के धार्मिक नेता अत्यन्त संकुचित मनोवृत्ति के हैं। इस काम के लिए नितांत अलग प्रकार के लोगों की आवश्यकता है, जो लोग धार्मिक तो हों किन्तु राजनीतिक नेतागिरी न करते हों और जिनके मन में समग्र राष्ट्र का ही विचार सदैव जागृत रहा हो, ऐसे लोग ही यह कार्य कर सकते हैं। धर्म के अधिष्ठान के बिना कुछ भी हासिल नहीं होगा। धार्मिकता होनी ही चाहिए। रामकृष्ण मिशन को ही लें। यह आश्रम व्यापक और सर्वसमावेशक धर्म-प्रचार का कार्य कर रहा है। अत: आज तो इसी दृष्टिकोण और वृत्ति की आवश्यकता है कि ईश्वरोपासना विषयक विभिन्न श्रध्दाओं को नष्ट न कर हम उनका आदर करें, उन्हें टिकाए रखें और उन्हें वृध्दिगत होने दें।
राजनीतिक नेताओं के जो खेल चलते हैं, उन्हीं से भेदभाव उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। जातियों, पंथों पर तो वे जोर देते ही हैं, साथ ही भाषा, हिन्दू-मुस्लिम आदि भेद भी वे पैदा करते हैं। परिणामत: अपनी समस्याएँ अधिकाधिक जटिल होती जा रही हैं। जाति संबंधी समस्या के मामले में तो राजनीतिक नेता ही वास्तविक खलनायक हैं। दुर्भाग्य से राजनीतिक नेता ही आज जनता का नेता बन बैठा है, जब कि चाहिए तो यह था कि सच्चे विद्वान, सुशील और ईश्वर के परमभक्त महापुरुष जनता के नेता बनते। परन्तु इस दृष्टि से आज उनका कोई स्थान ही नहीं है। इसके विपरीत नेतृत्व आज राजनीतिक नेताओं के हाथों में है। जिनके हाथों में नेतृत्व है, वे राजनीतिक पशु बन गये हैं। अत: हमें लोगों को जागृत करना चाहिए।
दो दिन पूर्व ही मैंने प्रयाग में कहा कि लोगों को राजनीतिक नेताओं के पीछे नहीं जाना चाहिए, अपितु ऐसे सत्पुरुषों का अनुकरण करें, जो परमात्मा के चरणों में लीन हैं, जिनमें चारित्र्य है और जिनकी दृष्टि विशाल है।

प्रश्न 5: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जातीय सामंजस्य-निर्माण का उत्तरदायित्व, बहुसंख्य समाज के रूप में हिन्दुओं पर है?
उत्तर : हाँ, मुझे यही लगता है। परन्तु, कुछ कठिनाइयों का विचार किया जाना चाहिए। अपने नेतागण सम्पूर्ण दोष हिन्दुओं पर लाद कर मुसलमानों को दोषमुक्त कर देते हैं। इसके कारण जातीय उपद्रव कराने के लिए, अल्पसंख्यक समाज यानी मुस्लिमों को सब प्रकार का प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए हमारा कहना है कि इस मामले में दोनों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।
प्रश्न 6: आपकी राय में आपसी सामंजस्य की दिशा में तत्काल कौन-से कदम उठाये जाने चाहिए?
उत्तर : इस तरह से एकदम कुछ कहना कठिन है। बहुत ही कठिन है। फिर भी सोचा जा सकता है। व्यापक पैमाने पर धर्म की यथार्थ शिक्षा देना एक उपाय हो सकता है। आज जैसी राजनीतिक नेताओं द्वारा समर्थित धर्महीन शिक्षा नहीं, अपितु सच्चे अर्थ में धर्म-शिक्षा। लोगों को इस्लाम का, हिन्दू धर्म का ज्ञान करायें। सभी धर्म मनुष्य को महान, पवित्र और मंगलमय बनने की शिक्षा देते हैं, यह लोगों को सिखाया जाये।
दूसरा उपाय यह हो सकता है कि जैसा हमारा इतिहास है वैसा ही हम पढ़ाएँ। आज जो इतिहास पढ़ाया जाता है, वह विकृत रूप में पढ़ाया जाता है। मुस्लिमों ने इस देश पर आक्रमण किया हो तो वह हम स्पष्ट रूप से बताएँ। परन्तु साथ में यह भी बताएँ कि यह आक्रमण भूतकालीन है और विदेशियों ने किया है। मुसलमान यह कहें कि वे इस देश के मुसलमान हैं और ये आक्रमण उनकी विरासत नहीं है। परन्तु, जो सही है उसे पढ़ाने के स्थान पर जो असत्य है, विकृत है, वही आज पढ़ाया जाता है। सत्य बहुत दिनों तक दबाकर नहीं रखा जा सकता। अन्तत: वह सामने आता ही है और उससे लोगों में दुर्भावना निर्माण होती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि इतिहास जैसा है वैसा ही पढ़ाया जाये। अफजलखाँ को शिवाजी ने मारा है, तो वैसा ही बताओ। कहो कि एक विदेशी आक्रमक और एक राष्ट्रीय नेता के तनावपूर्ण सम्बन्धों के कारण यह घटना हुई। यह भी बतायें कि हम सब एक ही राष्ट्र हैं, इसलिए हमारी परम्परा अफजलखाँ की नहीं है। परन्तु यह कहने की हिम्मत कोई नहीं करता। इतिहास के विकृतिकरण को मैं अनेक बार धिक्कार चुका हूँ और आज भी ऐसे धिक्कारता हूँ।
प्रश्न 7: भारतीयकरण पर बहुत चर्चा हुई, भ्रम भी बहुत निर्माण हुए तो क्या आप बता सकेंगे कि ये भ्रम कैसे दूर किये जा सकेंगे?
उत्तर : भारतीयकरण की घोषणा जनसंघ द्वारा की गयी है। किन्तु इस मामले में सम्भ्रम क्यों होना चाहिए? भारतीयकरण का अर्थ सबको हिन्दू बनाना तो है नहीं? हम सभी को यह सत्य समझ लेना चाहिए कि हम इसी भूमि के पुत्र हैं। अत: इस विषय में अपनी निष्ठा अविचल रहना अनिवार्य है। हम सब एक ही मानव-समूह के अंग हैं, हम सबके पूर्वज एक ही हैं, इसलिए हम सबकी आकांक्षाएँ भी एक समान हैं – इसे समझना ही सही अर्थ में भारतीयकरण है।
भारतीयकरण का यह अर्थ नहीं कि कोई अपनी पूजा-पध्दति त्याग दें। यह बात हमने कभी नहीं कही और कभी कहेंगे भी नहीं। हमारी तो यह मान्यता है कि उपासना की एक ही पध्दति, सभी मानव जातियों के लिए सुविधाजनक नहीं।
श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर “गुरूजी“, अद्वितीय जननायक थे । उनका संगठन कौशल अद्भुत था । संघ को प्रतिबन्ध के काल से निकाल कर न सिर्फ स्थापित किया अपितु डॉक्टर जी के विचार को उदार रूप में विकसित कर RSS के संस्कार को आगे बढ़ाया ।
संघ शतायु भाग 7 में पढ़िए उनके जीवन के बारे में और अधिक विस्तार से क्यूंकि, जीवन जीने का सही आधार, उचित दिशांतरण महापुरुषों से नहीं सीखेंगे तो किनसे सीखेंगे
Sangh Shatayu Part 5 :https://vskjodhpur.com/rssat100-sangh-shatayu-part-5-doctor-ji/