Vsk Jodhpur

राजनीति का निम्नतम स्तर

राजनीति का निम्नतम स्तर

कथित हिंदू आतंकवाद के संदर्भ में गृहमंत्री के बयान को एक गहरी साजिश का हिस्सा मान रहे हैं

बलबीर पुंज

केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा भारतीय जनता पार्टी और
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आतंकी प्रशिक्षण शिविर चलाने का आरोप लगाने से
सबसे ज्यादा हानि किसकी हुई है? अधिकांश भारतवासी जहां एक तरफ भाजपा और संघ
के राष्ट्रवादी चरित्र से परिचित हैं, वहीं शिंदे के रिकॉर्ड के कारण
उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। शिंदे के इस गैर जिम्मेदार बयान का कुप्रभाव
सबसे अधिक भारत पर पड़ेगा। पाकिस्तान हमेशा यह दावा करता रहा है कि उसके
यहां होने वाली आतंकी गतिविधियांे को न तो सरकार और न ही सेना का समर्थन
प्राप्त है। उसका कुतर्क यह भी है कि वह भी दूसरे देशों की तरह आतंकवाद से
पीड़ित है। अब पाकिस्तान भारत के गृहमंत्री के बयान को अंतरराष्ट्रीय मंचों
से उठाकर यह साबित करना चाहेगा कि आतंकवाद को प्रोत्साहन देने के लिए यदि
कोई कसूरवार है तो वह भारत है। भारत अब तक कहता आया है कि यहां आतंकवाद
सीमा पार से आता है, शिंदे के बयान के बाद दुनिया की नजरों में भारत की
जहां हास्यास्पद स्थिति हो गई है, वहीं पाकिस्तान के हाथ मजबूत हुए हैं।
कांग्रेस
वोट बैंक की राजनीति के कारण हिंदू आतंक का हौवा खड़ा करना चाहती है,
जिसके कारण अंतत: पाकिस्तान और पाक पोषित आतंकी संगठनों का मनोबल बढ़ रहा
है। भारत के बहुलतावादी ताने-बाने को ध्वस्त करने के लिए एक गहरी साजिश रची
जा रही है। मुंबई पर हमला करने आए आतंकियों के हाथों में कलावा बंधा होना व
माथे पर तिलक होना और हमले के पूर्व से कांग्रेसी नेताओं की ओर से ‘भगवा
आतंक’ का हौवा खड़ा करना क्या महज संयोग हो सकता है? मुंबई हमलों में
महाराष्ट्र आतंक निरोधी दस्ते के प्रमुख हेमंत करकरे की मौत के बाद
कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह दावा किया था कि करकरे ने फोन पर
बात कर उनसे हिंदूवादी संगठनों से अपनी जान का खतरा बताया था और अब शिंदे
द्वारा ‘हिंदू आतंकवाद’ का रहस्योद्घाटन कांग्रेस की वोट बैंक की राजनीति
के निम्नतम स्तर पर उतर आने का ही संकेत करता है। सारा घटनाक्रम एक गहरी
साजिश का परिणाम है। शिंदे ने न केवल समग्र रूप से हिंदू समाज को अपमानित
किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जगत में सहिष्णु व बहुलतावादी भारत की छवि
बिगाड़ने का काम भी किया है। सच्चई यह है कि मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस
में हुए बम धमाकों के बाद से ही वोट बैंक की राजनीति करने वाली कांग्रेस ने
तथ्यों को दबाते हुए ‘भगवा आतंक’, जो अब ‘हिंदू आतंक’ में बदल चुका है, का
हौवा खड़ा करना शुरू कर दिया। सरकारी मशीनरियों के दुरुपयोग से जो मनगढ़ंत
कहानी खड़ी की गई है, तथ्य व साक्ष्य उसकी पुष्टि नहीं करते।
एक
जुलाई, 2009 को अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने चार लोगों के संबंध में एक
प्रेस नोट जारी किया था। इनमें कराची आधारित लश्करे-तैयबा के आतंकी आरिफ
कासमानी का उल्लेख है। उस रिपोर्ट के आधार पर एक अंग्रेजी पत्रिका के 4
जुलाई, 2009 के अंक में रक्षा विशेषज्ञ बी. रमन का लेख प्रकाशित हुआ था। उस
लेख से कांग्रेस की घृणित साजिश का पर्दाफाश होता है। उक्त रिपोर्ट के अंश
यहां उद्धृत हैं, ‘आरिफ कासमानी अन्य आतंकी संगठनों के साथ लश्करे तैयबा
का मुख्य समन्वयकर्ता है और उसने लश्कर की आतंकी गतिविधियों में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाई है। कासमानी ने लश्कर के साथ मिलकर आतंकी घटनाओं को अंजाम
दिया, जिनमें जुलाई, 2006 में मुंबई और फरवरी, 2007 में पानीपत में समझौता
एक्सप्रेस में हुए बम धमाके शामिल हैं। सन 2005 में लश्कर की ओर से कासमानी
ने धन उगाहने का काम किया और भारत के कुख्यात अपराधी दाऊद इब्राहीम से
जुटाए गए धन का उपयोग जुलाई, 2006 में मुंबई की ट्रेनों में बम धमाकों में
किया। कासमानी ने अलकायदा को भी वित्तीय व अन्य मदद दी। कासमानी के सहयोग
के लिए अलकायदा ने 2006 और 2007 के बम धमाकों के लिए आतंकी उपलब्ध कराए।’
संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका द्वारा लश्कर और कासमानी को प्रतिबंधित करने के
छह महीने बाद पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री रहमान मलिक ने स्वयं यह स्वीकार
किया था कि समझौता बम धमाकों में पाकिस्तानी आतंकियों का हाथ था, किंतु
अपने यहां वोट बैंक की राजनीति के कारण जो कांग्रेसी साजिश चल रही थी उसका
ताना-बाना सीमा पार भी बुना गया। रहमान ने अपने उपरोक्त कथन में कहा,
‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित ने कुछ पाकिस्तान स्थित आतंकियों का इस्तेमाल
समझौता एक्सप्रेस में बम धमाका करने के लिए किया।’
समझौता एक्सप्रेस
में हुए बम धमाकों में जुटी जांच एजेंसियों ने भी पहले इसके लिए सिमी और
लश्कर को जिम्मेदार ठहराया था। सिमी के महासचिव सफदर नागौरी, उसके भाई
कमरुद्दीन नागौरी और अमिल परवेज का बेंगलूर में अप्रैल, 2007 में नारको
टेस्ट हुआ। उसमें पाया गया कि पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन की मदद से सिमी
ने बम धमाकों को अंजाम दिया है और सिमी के एहतेशाम सिद्दीकी व नसीर को
मुख्य कसूरवार बताया गया। हाल ही में अमेरिकी अदालत ने मुंबई हमलों के
दौरान छह अमेरिकी नागरिकों की हत्या के लिए डेविड हेडली को पैंतीस साल की
सजा सुनाई है। हेडली ने मुंबई समेत भारत के कई ठिकानों की रेकी थी। अमेरिका
के खोजी पत्रकार सेबेस्टियन रोटेला ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि
हेडली की तीसरी पत्नी फैजा ओतल्हा ने 2008 में ही यह कबूल कर लिया था कि
समझौता बम धमाकों में हेडली का हाथ है।
स्वाभाविक प्रश्न है
कि इतने साक्ष्यों के होते हुए भी सरकार समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों के
लिए हिंदू संगठनों को कसूरवार साबित करने पर क्यों तुली है? मालेगांव
धमाकों में भी सिमी की संलिप्तता सामने आने के बावजूद सत्ता अधिष्ठान
साधु-संतों को कसूरवार बताने के लिए बलतंत्र के बूते साक्ष्यों को दबाने पर
तुला है। मालेगांव बम धमाकों को लेकर कर्नल पुरोहित और उनके सहयोगियों के
खिलाफ अदालत में जो आरोप पत्र पेश किया गया है उसमें कहा गया है कि आरोपी
आइएसआइ से धन लेने के कारण संघ प्रमुख मोहन भागवत और संघ प्रचारक इंद्रेश
कुमार की हत्या की योजना बना रहे थे। यदि कथित हिंदू आतंकी संघ प्रमुख की
हत्या करना चाहते थे तो फिर संघ पर आतंकी प्रशिक्षण शिविर चलाने का आरोप
कैसे लगाया जा सकता है? शिंदे को अपने कहे की समझ भी है? मुंबई हमलों की
साजिश में पाकिस्तानी सेना और जमात उद दवा की संलिप्तता के पुख्ता प्रमाण
अमेरिकी जांच एजेंसी के पास है, किंतु कांग्रेस ‘हिंदू आतंकवाद’ का हौवा
खड़ा कर रही है। क्यों? ऐसा करने के लिए किसका दबाव है या इस काम का
पारितोषिक उसे क्या मिला है? क्या सरकार वोट बैंक की राजनीति के लिए असली
गुनहगारों को बचाना चाहती है?
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
cleardot
सोशल शेयर बटन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Archives

Recent Stories

Scroll to Top