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| सह सरकार्यवाह डा कृष्णगोपाल एवं अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख माननीय नन्द कुमार जी पत्रकारों से वार्ता करते हुए |
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| पत्रकारों से वार्ता का एक दृश्य |
प्रतिनिधि सभा के दुसरे दिन संवाददाताओं से बात करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ के सह सरकार्यवाह डाॅ.कृष्णगोपाल ने कहा कि पड़ोसी देषों से हो रही
घुसपैठ के कारण लगातार जनसंख्या असतुंलन बढ़ता जा रहा है, यह वृद्धि
प्राकृतिक नही है। डाॅ.गोपाल ने सरकार्यवाह सुरेष भैय्या जी जोशी द्वारा
श्रीलंका के तमिल पीडि़तों की समस्याओं और देष की वर्तमान परिस्थितियों पर
जारी दो वक्तव्यों की जानकारी भी दी।
डाॅ.कृष्णगोपाल ने संवाददाताओं द्वारा पूछे गए सवालों के जबाव देते हुए कहा
कि महिला उत्पीड़न के खिलाफ कानून तो अच्छा बनना ही चाहिए। इसके साथ ही
समाज, परिवार और शैक्षिणिक संस्थाओं में महिलाओं के प्रति आदर भी बढ़ना
चाहिए। हर घर, परिवार में संस्कार बढे ऐसे प्रयास समाज में होने चाहिए।
जारी व्यक्तव्य में बताया गया कि गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार
आयोग (यू.एन.एच.आर.सी.) की जेनेवा बैठक से ठीक पहले श्रीलंका सरकार को अपने
देश के तमिलों की समस्याओं का समाधान करने के लिए सक्रियतापूर्वक कदम उठा
उनके उचित पुनर्वास, सुरक्षा एवं राजनैतिक अधिकारों को भी सुनिश्चित करने
की मांग की गई थी। परन्तु एक वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी धरातल पर
स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। इस कारण से वैश्विक जगत का
श्रीलंका सरकार की मंशाओं के प्रति संदेह और गहरा हो गया है।
श्रीलंका सरकार को यह पुनस्र्मरण कराना चाहिए कि वह 30 वर्ष के लिट्टे
(एल.टी.टी.ई.) एवं श्रीलंका सुरक्षा बलों के मध्य हुए संघर्ष के
परिणामस्वरूप हुई तमिलों की दुर्दशा पर आँख मंूदकर नहीं बैठे, जिन्हें इस
कारण अपने जीवन, रोजगार, घरों और मंदिरों को भी खोना पड़ा। एक लाख से अधिक
तमिल आज अपने देश से पलायन कर तमिलनाडु के समुद्री किनारों पर शरणार्थी के
रूप में रह रहे हंै। श्रीलंका में स्थायी शांति तभी संभव है जब सरकार
उत्तरी एवं पूर्वी प्रान्तों तथा भारत में रहने वाले तमिल शरणार्थियों की
समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक एवं पर्याप्त रूप से ध्यान दे। भारत सरकार से यह
आग्रह हैं कि वह यह सुनिश्चित करे कि श्रीलंका सरकार विस्थापित तमिलों के
पुनर्वास तथा उन्हें पूर्ण नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रदान करने के लिए
जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार करे।
देष की वर्तमान परिस्थिति के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि सरकार की
अदूरदर्शितापूर्ण नीतियों से बढ़ते आर्थिक संकट और कृषि, लघु उद्योग व अन्य
रोजगार आधारित क्षेत्रों की बढ़ती उपेक्षा आज देश के लिए चिन्ता का कारण
बन कर उभर रही है। देश के उत्पादक उद्योगों की वृ़द्धि दर आज स्वाधीनता के
बाद सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुँच गयी है। इस गिरावट से फैलती बेरोजगारी,
निरंतर बढ़ रही महंगाई, विदेश व्यापार में बढ़ता घाटा और देश के उद्योग,
व्यापार व वाणिज्य पर विदेशी कम्पनियों का बढ़ता आधिपत्य आदि आज देश के लिए
गम्भीर आर्थिक सकंट व पराश्रयता का कारण सिद्ध हो रहे हैं।
कृषि की उपेक्षा से किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं, अधिकाधिक
किसानों का अनुबंध पर कृषि के लिए बाध्य होने और सरकार की भू अधिग्रहण की
विवेकहीन हठधर्मिता आदि से आज करोडों किसानों का जीवन संकटापन्न होने के
साथ ही, देश की खाद्य सुरक्षा भी गम्भीर रूप से प्रभावित हो रही है।
उन्होंने बताया कि आज गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ जहाँ हमारी अगाध
श्रद्धा का केन्द्र हैं, वहीं वे करोड़ों लोगों के जीवन का आधार होने के
साथ-साथ, देश के बहुत बड़े क्षेत्र के पर्यावरणीय तंत्र की भी मूलाधार हैं।
इन नदियों के प्रवाह को अवरूद्ध करने के सरकारों के प्रयास, उन्हें
प्रदूषण मुक्त रखने के प्रति उपेक्षा एवं उनकी रक्षार्थ चल रहे आन्दोलनों
की भावना को न समझते हुए उनकी उपेक्षा भी गम्भीर रूप से चिन्तनीय है। संघ
इन सभी जन आन्दोलनों का स्वागत करता है। कावेरी जैसे नदी जल विवाद भी
अत्यन्त चिन्ताजनक हैं। राज्यों के बीच नदी जल विभाजन व्यापक जन हित में,
न्याय व सौहार्द पूर्वक होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राचीन रामसेतु, जोे
करोडों हिन्दुओं की श्रद्धा का केन्द्र होने के साथ-साथ, वहाँ पर विद्यमान
थोरियम के दुर्लभ भण्डारांेेे को सुरक्षित रखने में भी प्रभावी सिद्ध हो
रहा है। उसे तोड़ कर ही सेतु-समुद्रम योजना को पूरा करने की सरकार की
हठधर्मिता, देश की जनता के लिए असह्य है। पूर्व में भी वहां से परिवहन नहर
निकालने हेतु सरकार द्वारा उसे तोडने के प्रयास आरंभ करने पर, उसे राम
भक्तों के प्रबल विरोध के आगे झुकना पडा है। आज शासन द्वारा पचैरी समिति के
द्वारा सुझाये वैकल्पिक मार्ग को अपनाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने
के शपथ पत्र से पुनः उसकी नीयत पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इसलिए हम सरकार
से अनुरोध करतेे हैं कि, जन भावनाओं का सम्मान करते हुए उसे तोड़ने का
दुस्साहस न करे। अन्यथा उसे पुनः प्रबल जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा। ऐसे
सभी सामयिक घटनाक्रमों के प्रति सरकार को जन भावनाओं को ध्यान में रखते
हुए देश हित में व्यवहार करना चाहिए।


