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ईरान युद्ध में भारत क्यों बन रहा है अहम मध्यस्थ, पाकिस्तान नहीं

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पश्चिम एशिया की कूटनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। जहां सार्वजनिक चर्चा में पाकिस्तान को वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संचार-सेतु के रूप में देखा जा रहा है, वहीं पर्दे के पीछे भारत एक अधिक महत्वपूर्ण और प्रभावी कूटनीतिक भूमिका निभाता दिख रहा है।

भारत की यह भूमिका केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है। संकट के शुरुआती चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच सीधे स्तर पर बातचीत हुई, जिससे यह संकेत मिला कि नई दिल्ली को शुरुआत से ही इस संकट की गंभीरता का आकलन था। इसके बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से दो हफ्तों में कम-से-कम चार बार बातचीत की। यह दोहरा संवाद—एक ओर वॉशिंगटन, दूसरी ओर तेहरान—भारत की अनोखी कूटनीतिक स्थिति को दर्शाता है।

भारत की अनोखी स्थिति

भारत उन गिने-चुने देशों में है, जिनके संबंध संकट के दोनों पक्षों से कार्यात्मक और भरोसेमंद हैं। एक तरफ भारत की अमेरिका के साथ रक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति में गहरी साझेदारी है। दूसरी तरफ, भारत के ईरान से ऐतिहासिक ऊर्जा, बंदरगाह और कनेक्टिविटी संबंध रहे हैं।

चाबहार जैसे परियोजना-आधारित रिश्ते भारत को केवल एक बाहरी दर्शक नहीं, बल्कि एक ऐसे देश के रूप में स्थापित करते हैं जो तनाव कम करने की दिशा में व्यावहारिक भूमिका निभा सकता है। भारत ने लगातार यह रुख अपनाया है कि पश्चिम एशिया में सैन्य टकराव का समाधान बातचीत और संयम से होना चाहिए। यही कारण है कि भारत की कूटनीति को अब “तटस्थता” नहीं, बल्कि “सक्रिय संतुलन” के रूप में देखा जा रहा है।

पाकिस्तान की सीमित भूमिका

इसके विपरीत पाकिस्तान की भूमिका अधिकतर संचार-वाहक तक सीमित दिखाई देती है। ऐतिहासिक रूप से इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने में मदद की है, लेकिन वह निर्णायक मध्यस्थ की स्थिति में नहीं रहा।

मौजूदा संकट में भी पाकिस्तान के जरिए कुछ संदेशों के आगे बढ़ने की बात कही जा रही है, लेकिन नीति-निर्माण या समाधान-निर्धारण की शक्ति भारत जैसी नहीं दिखती। अंतर यह है कि संदेश पहुंचाना और समाधान गढ़ना एक चीज़ नहीं है। एक माध्यम होना और परिणामों को प्रभावित करना—इन दोनों में बड़ा फर्क है।

भारत के हित सीधे जुड़े हैं

भारत का यह सक्रिय रुख केवल कूटनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, बल्कि उसके राष्ट्रीय हितों से भी जुड़ा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और उसके लाखों नागरिक खाड़ी देशों में रहते हैं।
यदि पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा कीमतों, समुद्री आपूर्ति शृंखलाओं, रेमिटेंस और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर पड़ेगा।

ईरान-समर्थित या क्षेत्रीय किसी भी तनाव का असर होर्मुज जलसंधि जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर भी पड़ सकता है, जिससे भारत की आर्थिक संवेदनशीलता बढ़ती है। इसलिए भारत के लिए यह केवल विदेश नीति का मसला नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का सवाल भी है।

वैश्विक संदर्भ में भारत

भारत की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीतिक मंचों पर प्रभावशाली आवाज़ बन चुका है। BRICS, G20, Quad और विभिन्न द्विपक्षीय मंचों पर भारत की भागीदारी उसे अमेरिका, रूस, चीन, खाड़ी देशों और ईरान—सभी के साथ संवाद करने की क्षमता देती है।

ऐसे समय में जब दुनिया पहले से ही यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा अस्थिरता और आपूर्ति-श्रृंखला संकट से जूझ रही है, भारत का संतुलित रुख उसे एक संभावित स्थिरकारी शक्ति बनाता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संकट और गहराता है, तो भारत उन चुनिंदा देशों में रहेगा जो सभी पक्षों से बात कर सकते हैं, बिना अपनी विश्वसनीयता खोए।

क्यों भारत, क्यों अब

भारत की ताकत इस बात में है कि वह एक साथ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी रखता है और ईरान के साथ संवाद की ऐतिहासिक परंपरा भी।
यही द्वैध संबंध उसे पाकिस्तान से अलग बनाता है। पाकिस्तान का स्थान अक्सर ट्रांजिट चैनल जैसा रहता है, जबकि भारत की भूमिका नीतिगत, आर्थिक और रणनीतिक है।

इस संकट में भारत शायद अकेले युद्ध नहीं रोक सकता, लेकिन तनाव घटाने, बातचीत की गुंजाइश बनाने और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में वह बेहद अहम भूमिका निभा सकता है।

इसी वजह से कूटनीतिक हलकों में यह समझ गहराती जा रही है कि ईरान संकट की असली मध्यस्थता इस्लामाबाद नहीं, बल्कि नई दिल्ली से आकार ले सकती है।

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