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तेल बनाम रेयर अर्थ: युद्ध का छिपा हुआ मकसद, चीन की एकाधिकार को चुनौती दे रहा अमेरिका

तेल के बाद अब रेयर अर्थ तत्व (आरईई) विश्व की भू-राजनीति का नया हथियार बन चुके हैं। चीन के हाथ में लगभग 90% वैश्विक रेयर अर्थ प्रसंस्करण क्षमता होने के कारण अमेरिका ने 2026 में इस एकाधिकार को तोड़ने का फैसला किया है। ये 17 दुर्लभ धातुएं – जैसे डिस्प्रोसियम, टरबियम, नियोडिमियम और प्रासियोडिमियम – आधुनिक तकनीक और रक्षा प्रणालियों की रीढ़ हैं। एफ-35 लड़ाकू विमान, निर्देशित मिसाइलें, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टरबाइन और स्मार्टफोन – इन सबमें रेयर अर्थ का इस्तेमाल होता है।

समस्या खनन की नहीं, बल्कि प्रसंस्करण की है। अमेरिका और अन्य देश कच्चे अयस्क निकाल सकते हैं, लेकिन उसे औद्योगिक रूप में परिवर्तित करने में चीन का दबदबा है। चार दशकों से चीन ने सब्सिडी देकर परिष्कृत रिफाइनिंग इकोसिस्टम तैयार किया है। अमेरिका ने लंबे समय तक इसे आउटसोर्स किया, लेकिन अब खतरा साफ है: अगर मुख्य आपूर्तिकर्ता सहयोग बंद कर दे तो क्या होगा?

इस सवाल का जवाब 4 अप्रैल 2025 को मिला। अमेरिकी टैरिफ के जवाब में चीन ने सात भारी रेयर अर्थ तत्वों पर निर्यात नियंत्रण लगा दिए। नतीजा तत्काल था – अमेरिका को रेयर अर्थ मैग्नेट निर्यात 93% गिर गया। कार निर्माता उत्पादन रोकने को मजबूर हो गए, रक्षा ठेकेदार विकल्प तलाशने लगे। अमेरिका और यूरोप की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई।

अक्टूबर 2025 में दूसरा झटका आया। चीन ने सामग्री से आगे बढ़कर प्रसंस्करण तकनीक, विशेषज्ञता और चीनी स्रोत वाले उत्पादों पर प्रतिबंध बढ़ा दिए – दुनिया भर में। पहली बार चीन ने अपनी आपूर्ति श्रेष्ठता को वैश्विक भू-राजनीतिक leverage में बदल दिया।

अमेरिका ने तुरंत कदम उठाया। एमपी मटेरियल्स, पश्चिमी गोलार्ध की सबसे बड़ी रेयर अर्थ कंपनी, टेक्सास में नई सुविधा बना रही है। पेंटागन के 400 मिलियन डॉलर निवेश, दीर्घकालिक मूल्य गारंटी और बैंकों से अरबों डॉलर की फाइनेंसिंग से मैग्नेट उत्पादन दस गुना बढ़ेगा। इसी तरह, यूएसए रेयर अर्थ को ओक्लाहोमा और टेक्सास में 3 अरब डॉलर से अधिक फंडिंग मिली है। उत्पादन समयसीमाएं तेज की जा रही हैं। रणनीति साफ है: निर्भरता कम करना, सप्लाई चेन सुरक्षित करना और औद्योगिक क्षमता वापस लाना।

लेकिन हकीकत कठिन है। चीन ने 40 साल में यह दबदबा बनाया, अमेरिका को इसे एक दशक में दोहराना है। यह केवल औद्योगिक बदलाव नहीं, बल्कि तकनीक, रक्षा और वैश्विक शक्ति की दौड़ है।

भारत का संदर्भ: चीन पर निर्भरता और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं। रक्षा क्षेत्र में रेयर अर्थ की भारी जरूरत के बावजूद भारत 90% से अधिक आयात पर निर्भर है, मुख्यतः चीन से। चीनी प्रतिबंधों ने भारतीय मिसाइल कार्यक्रम (जैसे अग्नि, ब्रह्मोस) और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को झटका दिया। 2025 के प्रतिबंधों के बाद भारत सरकार ने तत्काल कदम उठाए।

खान एवं भौतिक खनिज मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट्स और ओडिशा में रेयर अर्थ खदानें विकसित करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये का निवेश किया। आईआरसीटीसी (Indian Rare Earths Limited) को मजबूत किया गया, जो कोच्चि में नई प्रसंस्करण इकाई स्थापित कर रही है। 2026 तक भारत का लक्ष्य 10% वैश्विक प्रसंस्करण क्षमता हासिल करना है। प्रधानमंत्री मोदी की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत TRAXYS और Lynas जैसी विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय गठबंधन मजबूत करना चाहिए।

वैश्विक विशेषज्ञों के आकलन
वैश्विक थिंक टैंक स्ट्रेटेजी एंड इंटरनेशनल सेंटर (CSIS) के विशेषज्ञ जूली एलिजबेथ ने कहा, “रेयर अर्थ अब नया तेल है। चीन का एकाधिकार 2025 के प्रतिबंधों से टूटा, लेकिन अमेरिका-भारत जैसे देशों को 5-10 साल लगेंगे।” यूएस जियोपॉलिटिकल फ्यूचर्स के विश्लेषक पीटर ज़ेइहन ने चेतावनी दी, “यह व्यापार युद्ध नहीं, बल्कि तकनीकी स्वतंत्रता की जंग है। भारत जैसे उभरते बाजारों को जल्दी जुटना होगा, वरना चीन का leverage बरकरार रहेगा।”

ऑस्ट्रेलिया के लिनास रेयर अर्थ के सीईओ अमांडा लार्ड ने कहा, “2026 तक गैर-चीनी सप्लाई चेन 20% बढ़ेगी, लेकिन पर्यावरणीय चुनौतियां बाधा हैं। भारत और अमेरिका को हरित प्रसंस्करण पर फोकस करना चाहिए।”

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