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पूर्वोत्तर भारत और ईसाई षड्यंत्र

पूर्वोत्तर भारत और ईसाई षड्यंत्र
डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल
पूर्वोत्तर भारत इस देश की भौगोलिक तथा सांस्कृतिक विविधता में एकत्व का एक अनुपम उदाहरण है। यह विविधता यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य एवं जन-जीवन में सहज रूप से दृष्टिगोचर होती है।पूर्वोत्तर का यह भाग जो 1947 तक असम प्रदेश था, कालान्तर में सात बहनों-अर्थात् असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश के नाम से जाना जाता है। यह लगभग 40000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। जिस प्रकार से उत्तर पश्चिम से अनेक जातियां हिन्दुकुश के मार्ग से भारत आईं तथा यहां के जनजीवन से समरस हो गईं, उत्तर-पूर्व में ये जातियां असम की ओर से आईं तथा यहां अनेक जातियों का संगम हुआ। इनकी संख्या
लगभग 260 है।
ये जनजातियां भारत के अतीत रामायण, महाभारत, भागवत, पुराण काल से यहां के जीवन में एकरस हुईं। साथ ही विशिष्ट भौगोलिक रचना के कारण अपनी बोली, अपने परिवेश अपने रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं का वैशिष्ट्य भी बनाए रखा। प्रमुख जनजातियों में असम में कारबी, दिमच कछारी हैं, मेघालय में गारो, खासी तथा जयंतियां हैं। नागालैण्ड में आओ, अनगमी, सीमा, लोहता,रेन्ग्या चोंग आदि हैं। मणिपुर में मैइती सर्वाधिक हैं इसके अलावा ऐमोस,हमर, पैश्ते, थाड, बेपई तथा पूरम आदि हैं। मिजोरम में मिजो तथा कुछ गैर
मिजो-कूकी चिन आदि हैं। इसी भांति त्रिपुरा में रियांग तथा चकमक हैं।
अरुणाचल प्रदेश में लगभग 25 जनजातियां हैं। जिनमें अदी, अका, अपतनी,बांगरू, मीजी, मिसिंग, सिंगपों, वन्चू आदि हैं। इसमें अदी सर्वाधिक हैं तथा वन्चू सबसे कम।
पूर्वोत्तर का इतिहास सतत् संघर्ष तथा विजय का रहा है।यह 13वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक पठानों तथा मुगलों से संघर्ष करना रहा। यहां के इतिहास में कभी मुगलकाल नहीं रहा। 9वीं शताब्दी में यहां ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ। यह तभी से ईसाई कुचक्रों तथा 20वीं शताब्दी में चीटियों की भांति विशाल सैलाब के रूप में आए मुस्लिम घुसपैठियों का शिकार रहा है। जहां ब्रिटिश शासन में ईसाई मिशनरियों तथा उनकी गतिविधियों को खुलकर प्रोत्साहन दिया गया तथा उसे एक ‘क्राउन कालोनी’ बनाने का प्रयत्न चलता रहा वहां स्वतंत्रता के पश्चात कांग्रेस सरकार की वोट बैंक की राजनीति का शिकार गैरकानूनी रूप से बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों का आरामगाह बन गया। विश्व के इतिहास में कहीं भी, कभी इतनी घुसपैठ नहीं हुई।
ईसाई मिशनरियों के पुराने इतिहास पर नजर डालें तो नाथन ब्राउन तथा ओलिवर कट्टर, असम के सादिया नामक स्थान पर 1836 में पहुंचे। उनके आगमन को उत्तर-पूर्व भारत के इतिहास में एक महान घटना कहा गया। उल्लेखनीय है कि 1838 ई. में असम के हिन्दू अहोय वंश का 600 वर्षीय यशस्वी राज्य समाप्त हो गया था तथा असम पर अंग्रेजी राज्य प्रारम्भ हो चुका था, पर अभी तक पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक भी ईसाई न था। इनका प्रयत्न रहा कि स्थानीय व्यक्ति इनका सहयोग करें। मिशनरियों ने शिक्षा, प्रेस, भाषा द्वारा ईसाईयत का प्रचार प्रारम्भ किया। स्कूलों के गरीब तथा उजड़े छात्रों को आश्रय दिया। 1845 ई. तक शिवसागर, गौहारी तथा नौगांव में तीन चर्च स्थापित किए।
स्थानीय लड़का थूनकुम जो मिशनरी स्कूल का ही छात्र था, 1847 ई. में पहला ईसाई बना(देखें, एफ.सी.डाउस, माईटी वर्क्स ऑफ गॉड., पृ. 31-32) शिवसागर में बेतीराम  नामक एक छात्र को भी ईसाई बनाया जो मिशनरी स्कूल का ही था। 1840 ई. में शिवसागर, नौगांव तथा गुवाहाटी में लड़कियों के लिए स्कूल खोले, इसके अलावा
चिकित्सालय तथा अनाथालय खोले। ईसाई मिशनरियों ने1846 में शिवसागर में मिशन प्रेस लगाया तथा ओरुनोडोई मासिक पत्र निकाला। पादरियों ने इस समाचार पत्रिका द्वारा अपनी पहचान बनाने का प्रयत्न किया। यह पत्र 1882 ई. तक चला।
इसमें अहोय राजाओं को प्रचलित देवत्व का स्वरूप न मान को कहा। समाचार पत्रिका में स्थानीय जनजातियों की संस्कृति के प्रति उपेक्षा, परस्पर अलगाव तथा हिन्दुत्व के प्रति कटु विवेचना की गई, हिन्दुओं की आस्थाओं के प्रतीकों के प्रति भी कटुता पैदा की गई।
ईसाई पादरियों ने रोमन लिपि में असमी भाषा का प्रचार किया। एक शब्दकोष असमिया तथा अंग्रेजी में डॉ. माईल्स ब्रोनसन ने तैयार किया। अहोम शासकों द्वारा चले आ रहे संस्कृत शिक्षा केन्द्र को लक्ष्य बनाकर प्राचीन व्यवस्था को नष्ट किया। 
स्वतंत्रता के पश्चात
भारत के प्रसिद्ध विद्वान व चिंतक हो.वे. शेषाद्रि ने सही लिखा है कि ईसाइयत के मतान्तरण ने उन्हें जड़ों से काटकर पाश्चात्य संस्कृतियों का नामहीन और व्यक्तित्वहीन नकलचीभर बनाया तथा उनकी पुरानी मान्यताओं को न केवल समाप्त करने बल्कि उनसे घृणा करना सिखाया। (देखें पाञ्चजन्य, 3 जुलाई, 1983) साथ ही यह भी सही है कि स्वतंत्रता के पश्चात ईसाई मिशनरियों द्वारा अधिकतर मतान्तरित व्यक्तियों ने राष्ट्र विद्रोह की भूमिका असम क्षेत्र में अपनाई, बार कौंसिल आफ चर्चेज द्वारा प्रकाशित क्रिश्चयनिटी एण्ड ऐशियन  रेवोल्यूशन (1994) पुस्तक में स्वयं माना है कि ईसाइयत ने एशिया के लोगों को अपने देश की वफादारी से दूर किया (देखें पृ. 216) प्रसिद्ध गांधीवादी अर्थशास्त्री डा. जे.सी. कुमारप्पा ने लिखा है कि पाश्चात्य सेना के चार अंग-स्थल, वायु, नौसेना के अलावा चौथा है चर्च। रूस के जोसेफ स्टालिन ने भी चर्च की ‘अदृश्य सेना’ माना है।
स्वतंत्रता के पश्चात असम के विभिन्न भागों में अलगाव तथा भारत से स्वतंत्र होने का भाव मतान्तरित ईसाइयों द्वारा उठा। सर्वप्रथम नागालैण्ड में 1946 में ए.जेड फिजों के नेतृत्व में नागा नेशनल काउंसिल बनी। एक पत्र ‘नागा नेशन’ भी प्रकाशित किया गया।
भारत से अलग राष्ट्र बनाने की घोषणा की। भारत के विरुद्ध सशस्त्र भूमिगत आन्दोलन प्रारम्भ किया गया। आखिर पं. नेहरू ने 1 दिसम्बर 1963 में 16579 वर्ग के जिले को भारत का 16वां राज्य मान लिया। इसी भांति तुराई हिल वर्तमान मिजोरम में ईसाइयों द्वारा विद्रोह हुआ। लालडेंगा ने इसका नेतृत्व किया। फरवरी 1987 में इसे नया राज्य माना गया। इससे पूर्व जनवरी 1972 में मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा क्षेत्र को अलग राज्य का स्थान दिया गया।
अरुणाचल प्रदेश को भी 20 फरवरी, 1987 को पूर्ण राज्य माना गया। इसमें आज भी नागालैण्ड, मिजोरम, मेघालय ईसाई बाहुल्य राज्य हैं। मणिपुर भी ईसाई बाहुल्य बन गया हैं। अरुणाचल में आतंकवादियों के बल पर ईसाईयत का प्रभाव बढ़ा है।
यहां पर बतलाना आवश्यक है कि पूर्वोत्तर में आतंकवादी तथा विघटनकारी घटनाओं में विदेशी चर्च द्वारा प्रचुर मात्रा में धन का सहयोग मिला है। विदेशी ईसाई मिशनरियों द्वारा पूर्वोंत्तर में ईसाईकरण का अभियान चलाने के लिए आज भी सुदूर दुर्गम स्थानों में आर्थिक रूप से गरीब, उपेक्षित एवं वंचित लोगों को चिन्हित करते हुए उन्हें ईसाई बनाने का क्रम जारी है जो बहुत गंभीर चिन्ता का विषय है। भारतीयों ने किसी भी प्रदेश को नष्ट करके उसके भग्नावशेषों पर भवन नहीं बनाए कभी धार्मिक ग्रन्थों को जलाकर स्नान घर में पानी गर्म नहीं किया। किसी का जबरदस्ती मत परिवर्तन नहीं किया।
छत्रपति शिवाजी का कुरान का आदर एवं मुस्लिम महिला गौहरबानू बेगम को मां कहकर सम्मान देना विश्व प्रसिद्ध है। कुछ लोग यह बेहूदा प्रश्न करते हैं कि यदि यहां का उत्थान केवल हिन्दू संस्कृति के उत्थान से होगा तो बाकी अन्य समाज का क्या होगा? मुस्लिम कहां जाएंगे? ईसाइयो का क्या होगा? क्या आज वैसा ही करेंगे जैसा अमरीकियों ने नीग्रो तथा वहां के मूल निवासियों से किया या आस्ट्रेलिया जैसा जिन्होंने वहां की जनजाति को समूल नष्ट किया?
वास्तव में यह प्रश्न भ्रामक एवं दूरदर्शिता शून्य है। यदि हम केवल हिन्दू धर्म को ही लें। इसके अनेक सम्प्रदाय मत तथा पंथ है, जैसे शैव, वैष्णव शाक्त आस्तिक, नास्तिक, बौद्ध, जैन, सिख आदि। क्या वे भिन्न उपासना पद्धति के कारण भारतीय नहीं हैं? उनकी उपासना पद्धति अलग हो सकती है, पर राष्ट्रभक्ति, देशभक्ति की भावना कम नहीं होती। इसी भांति मुसलमान भी एक सम्प्रदाय है जिसे पूजा पद्धति की पूर्ण स्वतंत्रता है। परन्तु हिन्दू सहित सभी पहले भारतीय होने चाहिएं। यह कोई अनोखी बात नहीं है। चीन का रहने वाला पहले चीनी हैं। बाद में मुसलमान या बौद्ध है। इण्डोनेशिया का निवासी पहले वहां का निवासी है। बाद में है उसका रिलीजन।
हम यदि वास्तव में राष्ट्रीय एकता चाहते हैं तो नीर-क्षीर विवेक करना होगा। सत्यता को शब्द जाल में अधिक दिनों तक कैद मैं नहीं रखा जा सकता है। समान भाव के स्थान पर मुस्लिम तुष्टीकरण की विषवेल बोकर हम राष्ट्रीयता, एकता तथा स्वतंत्रता का अमृत फल नहीं चख सकते। बाहर से पत्ते चिपकाकर स्वतंत्रता का वह वृक्ष हरा नहीं रह सकता। छोटे वगोंर् को अस्पृश्य कहकर, दलित या हरिजन कहकर हम वंचित वर्ग को समरस नहीं कर सकते। प्रांत, भाषा, जाति, पंथ या वर्णभेद जगाकर राष्ट्रीय एकता नहीं स्थापित कर सकते। राष्ट्रीय एकता के लिए बाहरी रूप को छोड़कर सांस्कृतिक एकत्व का सूत्र पकड़ना होगा।
सौभाग्य से इस समय भारत में राष्ट्रवादी सरकार के आगमन से आशा की उम्मीदें बढ़ी हैं। सांस्कृतिक आधार पर भारत के सुदूर प्रांतों-पूर्वोत्तर में समरसता, आत्मीयता बढ़ेगी। भारत के पड़ोसी देशों के साथ सुदृढ़ सम्बंधों का आधार भी यही होगा। इतना ही नहीं, भारत विश्व में न केवल आर्थिक या सामरिक बल्कि विश्व बन्धुत्व तथा विश्व कल्याण की उच्चतम सांस्कृतिक भावना सेइन्हंे सशक्त, सुदृढ़ तथा सुसंगठित करेगा। राष्ट्रीय एकता का स्वरूप प्रदर्शनात्मक की बजाय क्रियात्मक होगा तथा राष्ट्रीय एकता केवल एक ‘हाबी’बनकर नहीं रहेगी।

साभार:पाञ्चजन्य

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