भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर एक बार फिर बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। अप्रैल 2025 में सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद अब भारत ने 1996 में हुई गंगा जल संधि को संशोधित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह संधि 2026 में समाप्त हो रही है और भारत ने संकेत दिए हैं कि वह अब नई शर्तों के साथ, छोटी अवधि (10-15 वर्ष) की लचीली संधि चाहता है, ताकि बदलती परिस्थितियों के अनुसार जल बंटवारे की समीक्षा की जा सके.
गंगा जल संधि: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गंगा जल संधि 12 दिसंबर 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच हस्ताक्षरित हुई थी। इसका उद्देश्य फरक्का बैराज से सूखे मौसम (1 जनवरी से 31 मई) में गंगा के जल का बंटवारा करना था। संधि के तहत दोनों देशों को 35,000 क्यूसेक पानी 10-10 दिन के अंतराल में मिलता है। यदि प्रवाह 70,000 क्यूसेक से कम हो, तो दोनों को बराबर-बराबर पानी मिलता है.
भारत क्यों चाहता है बदलाव?
तीन दशक बाद भारत का मानना है कि देश की बढ़ती विकास जरूरतों—जैसे सिंचाई, औद्योगिक विकास, बिजली उत्पादन और कोलकाता पोर्ट के रखरखाव—को देखते हुए उसे अधिक जल की आवश्यकता है। भारत अब मार्च से मई के बीच 30,000-35,000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की मांग कर रहा है। साथ ही, भारत चाहता है कि संधि की अवधि 10-15 वर्ष रखी जाए, ताकि भविष्य में जरूरत के अनुसार संशोधन संभव हो सके.
बांग्लादेश की चिंता
बांग्लादेश को डर है कि भारत की नई शर्तों से उसे मिलने वाला पानी कम हो सकता है, जिससे वहां की कृषि, पेयजल और उद्योग प्रभावित होंगे। बांग्लादेश ने बार-बार कहा है कि गंगा का जल उसके लिए जीवनरेखा है और किसी भी कटौती से देश में जल संकट गहरा सकता है.
राजनीतिक और कूटनीतिक असर
सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद भारत की कूटनीतिक नीति में बदलाव साफ दिख रहा है। अब भारत अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है और जल संसाधनों के बंटवारे में लचीलापन चाहता है। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों ने भी केंद्र सरकार के सामने अपनी जल जरूरतों को प्रमुखता से रखा है.
आगे की राह
मार्च 2025 में कोलकाता में दोनों देशों के तकनीकी दलों की बैठक हुई, जिसमें जल प्रवाह की संयुक्त माप और नई संधि के लिए विशेषज्ञ स्तर की बातचीत शुरू हुई। जलवायु परिवर्तन और गंगा के प्रवाह में आ रहे बदलाव भी नई संधि की शर्तों को प्रभावित करेंगे.
यह घटनाक्रम न केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया तनाव ला सकता है, बल्कि दक्षिण एशिया में जल कूटनीति और क्षेत्रीय राजनीति को भी गहराई से प्रभावित करेगा।