जवाब – डा. मोहनराव जी भागवत
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| सरसंघचालक डा. मोहनराव जी भागवत उध्बोदन देते हुए |
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| “मैं खानुआ बोलता हूँ ” का लोकार्पण करते हुए सरसंघचालक जी |
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| “मैं खानुआ बोलता हूँ ” पट्टिका का इक दृश्य |
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| विजिटर बुक में सन्देश लिखते हुए सरसंघचालक जी साथ में है क्षेत्रीय प्रचारक दुर्गादास जी |
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| स्मारक का इक विहंगम दृश्य |
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| स्मारक का इक दृक्ष्य |
भूले हैं तब-तब हार हुई है। खानवा का युद्ध भारत के स्वभाव का परिचायक है
और यहां बना राणा सांगा स्मारक विदेशी आक्रांता के बनाए बुलंद दरवाजे का
जवाब। इतिहास में यह युद्ध मील का पत्थर माना गया. इस युद्ध में भारत माता के वीर पुत्रों ने जिस राष्ट्रीय एकता का परिचय दिया व् स्वभाव बताया था, उसी राष्ट्रीय एकता के संकल्प को लेकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है. खानुआ युद्ध के बाद सीकरी में बने बुलंद दरवाजा से बुलंद स्मारक यहाँ खड़ा हो रहा हैं। हम सभी की आशा है कि यह स्मारक पूर्ण भव्यता एवं तीर्थस्थल के रूप में विकसित हो। उन्होंने कहा कि राणा सांगा स्मारक को भव्य बनाना चाहिए ताकि नई
पीढ़ी भारत के स्वभाव से परिचित हो सके। यहाँ आने वाला हर कोई यहाँ की मिटटी से तिलक करे और पुड़िया में लेकर जाये .
सरसंघचालक जी ने अपने उध्बोधन में सबसे पहले खानुआ के इस छोटे से गाँव में रहने वालों को विनम्रता पूर्वक प्रणाम करते हुए कहा कि आप इस वीर भूमि में निवास कर रहे है आपको प्रणाम !!
चार दिवसीय
प्रवास पर शुक्रवार प्रातः को ही भरतपुर पहुंचे सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत जी का यह पहला सार्वजनिक
कार्यक्रम था।
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| कार्यक्रम में उपस्थित जन समूह |
सरसंघचालक डा. मोहनराव जी भागवत ने अपने उध्बोधन में कहा कि खानुआ गांव भारत के इतिहास का
मोड़ हैं। विदेशी आक्रांता बाबर यहां आया तो उससे युद्ध करने करने के लिए
हसन खां मेवाती सहित देश की तमाम रियासतों के राजा और योद्धा महाराणा सांगा
के नेतृत्व में एकजुट हो गए थे। इन सब ने भारत मां की तौहीन करने वाले
बाबर का विरोध किया। हालांकि बाबर ने हसन खां मेवाती को मुसलमान होने का
वास्ता देते हुए साथ देने की बात कही। इस पर हसन खां ने जवाब भेजा कि हमारा
मजहब एक हो सकता है, किंतु आप भारत के विरोधी हैं। हसन खां मेवाती ने राणा
सांगा का पक्ष लेकर भारत के स्वभाव को बताया। यद्यपि इस युद्ध में राणा
सांगा की हार हुई थी, किंतु भारत के इस स्वभाव को बाद में देश के राजाओं ने
महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी का साथ देकर जताया था। यह भावना हमेशा
जारी रहनी चाहिए।
खानुआ में बाबर को दिया गया जवाब केवल गौरव का विषय ही नहीं है बल्कि सम्पूर्ण जीवन का रस है. इस रस को लेकर जब हम जीते है एवं राष्ट्रीय एकता की पालना करते है तब सुखी भारत पूरी दुनिया को सुखी करता है लेकिन जब हम भूल जाते है तब भारतवासी दुखी होता है।
डा. मोहनराव भागवत जी का पूरा संबोधन राणा सांगा पर केंद्रित रहा।
उन्होंने सांगा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए
प्रेरणा लेने पर बल दिया।
भेद करते है तो हार जाते है
डा. भागवत जी ने अपने उध्बोधन में आगे कहा कि भारत में लगभग ७ लाख गाँव हैं इन सभी की बोली, रीती रिवाज़ तथा रहन सहन अलग अलग हैं लेकिन सभी भारत माता के पुत्र है. जब हम जाट पात का है तब हम हार जाते हैं। देश की एकता अखंडता की
रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर करना हमारा पहला धर्म है। राणा सांगा ने अखंडता का
संदेश दिया।
“मैं खानुआ बोलता हूँ ” का किया लोकार्पण
सरसंघचालक डा. मोहन जी भगवत ने राणा सांगा स्मारक के अवलोकन करने के पश्चात गीत “मैं खानुआ बोलता हूँ ” की पट्टिका का लोकार्पण किया।
“विजिटर बुक “में लिखा सन्देश
स्मारक के अवलोकन के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन जी भागवत ने अपने सन्देश में लिखा कि “शाश्वत सनातन भारत की रक्षा तथा संवर्धन के लिए सतत प्रेरणा देने वाले इस स्थल का उसी रूप में विकास करने का कार्य हो रहा है , सभी कार्यकर्ताओ का अभिनन्दन “.
कार्यक्रम की अध्यक्षता संत बालकदास महाराज ने की।
उन्होंने कहा कि मुनि और ऋषियों के काम को संघ आगे बढ़ा रहा है। ईश्वर मनुष्य का भाग्य बनाता है और संघ मनुष्य का सौभाग्य। संघ हमें
जीना सिखाता है।
कार्यक्रमके विशिष्ट अतिथि धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के
अध्यक्ष ओंकारसिंह लखावत ने कहा कि इतिहास को पुन: लिखने की आवश्यकता जताई।
उन्होंने कहा कि अभी तक अबुल फजल और कर्नल टाड का लिखा विकृत इतिहास
पढ़ाया जा रहा है। इसमें भारत के पक्ष को ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया
है। उन्होंने कहा कि सरकार देश की एकता और अखंडता का संदेश देने वाले
स्मारक खड़े कर रही है। इसी कड़ी में करीब 35 स्मारक राजस्थान में बनाए जा
रहे हैं।
इस अवसर पर पर विशिष्ट अतिथि पर्यटन मंत्री कृष्णेंद्र कौर
दीपा ने
लोकार्पण टिकट
खरीदने वाले खरीदारों को सम्मानित किया गया।
अखण्डता और अक्षुण्णता को जीवन का सर्वोपरि
ध्येय बनाकर सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले महाराणा सांगा (महाराणा संग्राम
सिंह ) की स्मृति को चिर स्थाई बनाये रखने के लिए राणा सांगा स्मृति
समिति – खानुआं , रूपवास , भरतपुर ने यह कार्यक्रम आयोजित किया था
उल्लेखनीय है कि खानुआं का युद्ध १७ मार्च
१५२७ को आगरा से ६० किमी दूर खानुआं गाँव (रूपवास , भरतपुर) में लड़ा गया था। बाबर द्वारा लड़ा
गया पानीपत के युद्ध के बाद यह दूसरा बड़ा युद्ध था।
पूर्व में समितिके संरक्षक डा. जीसी कपूर तथा
अध्यक्ष हरि ओमसिंह जादौन ने सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत का पुष्पगुच्छ
भेंट कर स्वागत किया। धीरेंद्र बिष्ट ने वंदेमातरम् गीत प्रस्तुत किया।
प्रारंभ में संघ प्रमुख ने राणा सांगा स्मारक पर पुष्प चढाए। इस मौके पर
कवि सूर्यद्विज द्वारा लिखित और प्रकाश माली द्वारा संगीतमय गीत मैं खानवा
गांव बोल रहा हूं का भी संघ प्रमुख ने लोकार्पण किया। साथ ही कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचारक दुर्गादासजी, अखिल भारतीय अधिकारी गुणवंत सिंह जी कोठारी,जयपुर प्रान्त प्रचारक शिव लहरी जी, सह प्रान्त प्रचारक निम्बा राम जी, सांसद
बहादुरसिंह कोली, पूर्व मंत्री डा. दिगंबरसिंह, विधायक विजय बंसल, सहित
बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम स्थल पर
निहाला एंड पार्टी शीशवाड़ा ने बंब वादन एवं लोक गायन किया। इसमें कई संदेश
दिए गए।







