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संगठन शास्त्र के ‘पाणिनि’ – श्रीगुरुजी’

-श्रीनिवास वैद्य 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज देश के ‘सेंटर स्टेज’ पर है| संघ की प्रेरणा से कार्यरत विभिन्न संस्थाएँ समाज जीवन में
प्रभावशाली कार्य कर रहीं हैं| देश के ही नहीं, अपितु विश्‍व के लोग संघ की ओर बड़ी आशा से देख रहे है| संघ को यह स्थिति आसानी से प्राप्त नहीं हुई| 90 साल की अविरत साधना के फलस्वरूप यह स्थान मिला है| यह साधना थी- संगठन के लिए संगठन का कार्य- इस मंत्र की| इस मंत्र को यथार्थ के धरातल पर जिस महान व्यक्ति ने आविष्कृत कर दिखाया, वे थे संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी| संगठन मजबूत हो, यह मंत्र आज भी उतनाही प्रासंगिक है|

श्रीगुरुजी ने संगठन शास्त्र का एक नया अध्याय लिखा है| उसका संक्षिप्त परामर्श, श्रीगुरुजी के पुण्यस्मरण के दिन लेना अप्रासंगिक नहीं होगा|1948 ई. में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(संघ) पर पाबंदी का समय कठिणतम था| विश्‍ववंद्य महात्मा गांधी की हत्या काआरोप संघ पर लगाया गया था| पूरे समाज में संघ के प्रति घृणा तथा क्रोध का

वातावरण था| दिल्ली से गली तक सारी सरकारी यंत्रणा संघ को कुचलने में प्रयासरत थी| स्वातंत्र्य आंदोलन में अग्रणी रहें सभी नेता गण विविध स्तर के सरकारों में पदस्थ थे और उनपर जनता का विश्‍वास था| वे सभी नेता, महात्मा गांधी की हत्या में संघ का हाथ है, ऐसा प्रचार कर रहें थे और जनता ने भी यह मान लिया था| इस समय संघ के सरसंघचालक थे माधव सदाशिव गोळवलकर उपाख्य श्री गुरुजी| श्री गुरुजी को हत्या के आरोप में कारागृह में बंदी बनाया गया था| चारो ओर अंधेरा, निराशा, हताशा, उत्तेजना थी| इस अंध:कारमय परिस्थितिसे श्रीगुरुजी ने संघ को केवल बाहर ही नहीं निकाला, अपितु उसे प्रगति के मार्ग पर चलित किया| आज भी इस वातावरण की मात्र कल्पना से मन सिहर उठता है|
संघ स्थापना के मात्र १५ वर्ष बाद ही डॉ. हेडगेवार केवल 50 वर्ष की आयु में असमय कालकवलित हुए| उस समय संघ का अधिकांश कार्यकर्ता वर्ग आयु में छोटा था| संघ कार्य का आकार व बल भी यद्यपि अखिल भारतीय रूप ले चुका था, अभी अत्यल्प ही था| ऐसी स्थिति में इस नवजात संघ शिशु को सुपोषित कर मार्ग की सभी प्रकार की बाधाओं को उसे पार कराते हुए आगे ले जाने के कार्य का गुरुभार सरसंघचालक इस नाते श्रीगुरुजी
के कंधों पर आ पड़ा| तब उनकी आयु मात्र 35 वर्ष की थी| संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार सार्वजनिक जीवन में अनुभवी थे| उस तुलना में श्रीगुरुजी वैसे देखा जाय तो अनुभवहीन थे| सरसंघचालक का पदभार संभालने के बाद आठ साल में ही संघ पर संघबंदी रूपी वज्राघात हुआ| देश को स्वतंत्रता मिलें अभी साल भी नहीं हुआ था| महात्मा गांधीजी की हत्या ने पूरा देश आंदोलित हो चुका था|

श्रीगुरुजी के संगठन कौशल्य की तथा नेतृत्व क्षमता की यह परीक्षा-घड़ी थी| श्रीगुरुजी ने इस संकटकाल में जो क्षमता प्रदर्शित की, वह चिंतन का विषय है; प्रेरणा का विषय है|संघ के एक ज्येष्ठ विचारक श्री. मा. गो.वैद्य कहते है- आज जो भी संघ है, उसका कारण, उसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना है तो वह प.पू. गुरुजी को जाता है| संघ का जो आज का स्थान है, अपनेराष्ट्र के जीवन में वह बड़ा महत्त्व का है| अंग्रेजी में जिसको ‘सेन्टर स्टेज’ बोलते है, उस सेन्टर स्टेज पर संघ आ गया है, वह किसी की कृपा से नहीं| संघ के स्वयंसेवकों के परिश्रम से तथा श्रीगुरुजी ने संघ को जो दिशादी, जो तत्त्वज्ञान दिया, जो दर्शन दिया, उसके कारण यह स्थिति आई है|

संघ पर प्रतिबंध अन्यायपूर्ण था| गुरुजी का कारावास भी अन्यायपूर्ण था, लेकिन इस अन्याय के शिकार होने के बावजूद भी गुरुजी के मुख से न सरकार के विरोध में और न जनता के विरोध में एक शब्द निकला| जब संघ के कार्यालयों के ऊपर, संघ के स्वयंसेवकों के मकानों पर, खास करके महाराष्ट्र में भीषण हमले हुए| करोड़ों की संपत्ति जलाई गई, नष्ट की गई, तब भी उन्होंने कभी गुस्सा प्रकट नहीं किया| केवल यही कहते रहे कि दातों तले अगर जिव्हा आ जाती है तो जिव्हा को कष्ट जरूर होता है लेकिन दांत गिराये नहीं जाते| उनके सारे भाषणों का सार यहीं था- जो हो गया, वह हो गया, भूल जाओ और काम में लग जाओ|श्री गुरुजी के इस सकारात्मक रवैये से संघ कार्य फिर से, उत्साह से प्रारंभ हुआ| इस समय संघ के अंदर तथा बाहर भी एकचर्चा चली थी| स्वतंत्रता मिलने के बाद अब संघ की आवश्यकता नहीं रहीं है|
संघ ने सामाजिक संस्था के नाते समाज सेवा तथा राजनीति के क्षेत्र में जाना चाहिए| इस घटना के बारे में श्री. मा. गो. वैद्य लिखते है- अब (स्वतंत्रता के बाद) वातावरण बदल गया था| नये विचार मन में आना शुरू हुआ| संघ पर जब प्रतिबंध आया तब स्वतंत्रता मिले केवल पॉंच-छ: महिने हुए थे| संघ की प्रतिज्ञा में एक विशेष वाक्य था जो आज की प्रतिज्ञा में नहीं है| और वह था कि ‘हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ|’ तो चर्चा होना स्वाभाविक है कि अब संघ का काम क्या है?

संघ की अब आवश्यकता क्या है? जिनके घरों पर हमले हुए थे, जो जख्मी हुये थे वे तो यही कहते थे कि अब इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं है| संघ अब खड़ा नहीं हो सकता| लेकिन खड़ा हो गया| संघ कॉंग्रेस की नीति और रीति पर चल कर ही देश का भला कर सकता है, ऐसा सरदार पटेल का भी कहना था| 1950 के नवम्बर में देश का नया संविधान आया| नयी पार्टियॉं बनने लगी| तो अपने (संघ के) लोगों को भी लगा कि हिन्दुत्व का विचार लेकर एक राजनीतिक पक्ष बनना चाहिए| हिन्दू सभा थी, लेकिन महात्मा गांधीजी की हत्या में उनके बड़े बड़े नेताओं का नाम आने के कारण उसका कोई भविष्य नहीं है, ऐसा सबका मूल्यांकन था|…. सत्ता के द्वारा ही समाज की सारी समस्याओं का इलाज हो सकता है, ऐसा वातावरण भी बना था| अत: राजनीतिक कार्यक्रम को स्वीकार कर पूरी शक्ति के साथ राजनीतिक क्षेत्र में संघ ने कूदना चाहिए| अब प्रतिदिन की संघ शाखा की पद्धति की कोई आवश्यकता नहीं| दक्ष-आरम् बहुत हो चुका है| यदि वह चालू रखना है तो अवश्य रखें किन्तु समाज जीवन के अन्य आयामों के प्रति भी सजग रहना आवश्यक है|….

ऐसे विचार सर्वत्र प्रकट होना प्रारंभ हो चुके थे| लेकिन गुरुजी संघ कार्य की महता पर अड़िग थे| गुरुजी समाज जीवन के इन अन्यान्य क्षेत्र के कार्यों की सराहना करते थे| किन्तु वे इस पर दृढ़ थे कि ये संघ के पर्याय नहीं हो सकते| आनुषंगिक ही हो सकते है|


इस अति उत्साह भरे वातावरण में गुरुजी कहते थे- मुझे अच्छी शाखा चाहिए| प्रतिबंध के काले काल में शाखा की
व्यवस्था ढीली पड़ी थी| उसको ठीक और चुस्त करना आवश्यक था| गुरुजी का जोर उसपर था| सारे लोग राज्य की शक्ति का विचार करते थे| गुरुजी राष्ट्र की शक्ति का अग्रक्रमसे विचार करते थे| मूलभूत राष्ट्र-शक्ति के बिना अन्य सब प्रकार की शक्तियॉं कारगर नहीं हो सकती इस पर उनका अटल विश्‍वास था| हवा में उड़ान वे समझ सकते थे; किन्तु जमीनपर पॉंव पक्के गड़े रहें इसकी वे ज्यादा चिन्ता करते थे| गुरुजी ने नीचे की वास्तविकता को कभी नजर अंदाज नहीं किया और न उच्च आदर्श को आँखों से ओझल होने दिया|श्री गुरुजी के इस आग्रह का परिणाम यह हुआकि, संघ फिर से अपने पैरों पर सामर्थ्य से खड़ा हुआ| श्री गुरुजी ने अपनी सारी शक्ति संघ को पुनरुज्जीवित करने में लगा दी| जीवन का प्रत्येक क्षण संघ शाखा की पुनर्स्थापना के लिए खर्च किया| यह कार्य सामान्य मनुष्य नहींकर सकता था| राजनीति का आकर्षण, तथा आमंत्रण गुरुजी ने निग्रहपूर्वक ठुकरा दिया| इस तपस्या का फल क्या मिला?

संघ के भूतपूर्व सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन जी ने एक भाषण में कहा था- ‘‘पहले लोग हमसे पूछते थे ‘संगठन करके क्या करोगे?’ तब हम कहते थे ‘संगठन करेंगे| संगठन के लिए संगठन करेंगे|’ किसी की समझ में हमारी बात नहीं आती थी| आज कोई नहीं पूछता, क्योंकि वे जान गए हैं कि हमारे स्वयंसेवकों ने किस प्रकार समाज के हर क्षेत्र में जाकर हिन्दू चिन्तन के आधार पर वहॉं की समस्याओं के हल निकाले हैं| समस्याओं का हिन्दू समाधान प्रस्तुत किया है| समस्याओं के समाधान करने के लिए संस्थाएँ निकाली हैं| समाज जीवन के सभी लोगों को साथ लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं| हर क्षेत्र में प्रगति हो रही है|’’
1972 में ठाणे में श्रीगुरुजी ने सात दिन तक सारा जीवनदर्शन, हिंदुत्व का सारा जीवनदर्शन, जो राष्ट्र का जीवनदर्शन है, विस्तारपूर्वक बताया| हिंदू की परिभाषा क्या है, यह सब बताया| हिंदुत्व को उन्होंने और व्यापक बनाया|

1954 ई. में सिंदी (महाराष्ट्र) में सम्पन्न कार्यकर्ताओं की बैठक में गुरुजी ने कहा- ‘‘पिछले कुछ वर्षों से संघ कार्य के साथ-साथ और भी कुछ बातें चल रही हैं| उदाहरणार्थ, कुछ वर्ष पूर्व अपने प्रयत्नों से अखबार, पाठशालायें, दवाखाने आदि आरंभ हुए हैं|

सिद्धान्त के रूप में यह मैं अवश्य कहूँगा कि संघ कार्य स्वतंत्र एवं सर्वांगपूर्ण है, उसकी पूर्ति के लिए इन बातों की आवश्यकता नहीं| ये सब काम हमें नित्य चलनेवाले संघ कार्य के साथ ही करने चाहिए| ये तो संघ कार्य के सम्पूरक ‘एडिशन’ है, पर्याय ‘सब्टिट्यूशन’ नहीं| हमारा हिंदू राष्ट्र है| इसका संवर्धन और संरक्षण ही हमारे कार्य की दृष्टि नहीं, अपितु उसका विकास और विस्तार भी हमारा लक्ष्य है|’’

महात्मा गांधी की हत्या हुई उस समय गुरुजी मद्रास (अब चेन्नई) में थे| हवाई जहाज से वे तुरन्त नागपुर आए| पहला वाक्य बोले, ‘‘संघ बीस साल पीछे चला गया|’’ इस वाक्य पर हमने विचार करना चाहिए| संघ की स्थापना 1925 में हुई थी| यानि 1948 में संघ 23 साल का था| गुरुजी कहते है कि संघ 20 साल पीछे चला गया, इसका मतलब महात्मा गांधीजी की हत्या ने संघ 3 साल का जितना था उतना पीछे ढ़केल दिया| करीबन शून्य पर खड़ा कर दिया| इस शून्य से वटवृक्ष तक विस्तार करने का भगीरथ प्रयास श्रीगुरुजी ने अपने जीवनकाल में किया| यह अद्भुत कार्य है, अकल्पित है|

इसी कारण संघ के विद्यमान सरसंघचालक श्री. मोहनराव भागवत जी कहते है- ‘1940 से 1973 त के अपने 33 वर्षों के सुदीर्घ कार्यकाल में पू. गुरुजी ने संघ कार्य को राष्ट्रीय तथा आंतरराष्ट्रीय घटनामंच पर उदीयमान सात्त्विक हिन्दू शक्ति का स्थान प्राप्त करा दिया| संघ के और देश के जीवन में यह सारा कालखण्ड पराकोटि का उथलपुथल भरा, संकटपरिपूर्ण तथा देश के सभी मान्यवर प्रमुख व्यक्तियों के कर्तृत्व परीक्षा का कालखण्ड था| अपने वज्रकठोर, दृढनिश्‍चय, सतत परिश्रम, प्रखर बुद्धिमत्ता व अड़िग निष्ठा के सहारे सभी स्वयंसेवकों को अपने स्नेह से चैतन्य व विश्‍वास प्रदान करते हुए आत्मविश्‍वास से पू. श्री गुरुजी ने कैसे पार किया वह तेजस्वी व रोमांचकारी इतिहास सबके सामने है|’
संघ की दैनंदिन शाखा, जो संघ कार्य का प्राणतत्त्व है, को और अधिक सक्षम तथा प्रभावी बनाने के लिए तन-मन-धन पूर्वक जुट जाना ही, श्रीगुरुजी को सच्ची श्रद्धांजलि है| 
संदर्भ
  1. 1. श्री गुरुजी : एक अनोखा नेतृत्व. सुरुचि प्रकाशन
  2. 2. हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति, हिन्दू समाज, हिंदू राष्ट्र. श्रीभारती प्रकाशन  
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