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पृथ्वी दिवस पर विशेष – अब नहीं संभले तो फिर कब संभलेंगे

ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता खतरा प्रदूषण की मार मौसम का बदलता मिजाज घटते जंगल पेयजल का बढ़ता संकट और विलुप्त होती प्रजातियों जैसी तमाम समस्याओं के बारे में विद्वानों का कहना है कि अब नहीं संभले तो संभालने को कुछ बाकी नहीं बचेगा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने ग्लोबल वार्मिंग जैसे ज्वलंत और जटिल मुद्दे पर कहा यह समस्या विकसित देशों ने खड़ी की है। ये देश अपने विकास के लिए विश्व को पर्यावरण संबंधी झंझावात में धकेल रहे हैं। अमेरिका जैसे विकसित देश हर साल करीब 20 टन कार्बन का उत्सर्जन करते हैं जो भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों के लिए बहुत अधिक है।उन्होंने कहा कि पर्यावरण असंतुलन के कारण ही मौसम परिवर्तन हो रहा है। गर्मी बारिश और ठंड के असंतुलन का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। गर्मियों में जंगल में लगने वाली आग पर अंकुश लगाने के लिए प्रणाली विकसित किए जाने की सख्त जरूरत है।तीसरी दुनिया के देशों को कटघरे में खड़ा करते हुए सुनीता ने कहा तीसरी दुनिया के देशों का सबसे बड़ा दोष यह है कि वे विकसित देशों पर पृथ्वी पर बढ़ रहे असंतुलन से बचाने के लिए समुचित दबाव बनाने में विफल रहे है। टेरी से जुड़ी अन्नपूर्णा ने कहा पृथ्वी दिवस पर्यावरण दिवस और एड्स दिवस के प्रति लोगों में गंभीरता बढ़ती जा रही है लेकिन कोशिश करनी चाहिए यह सब मात्र उत्सव बनकर न रह जाये बल्कि सही दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ाये जाये।उन्होंने कहा विकसित देशों की नकल करके हम आधारभूत ढांचे विकसित कर रहे हैं। लेकिन खामी यह है कि तीसरी दुनिया के देश संभलकर चलने की बजाय गलतियों की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।उन्होंने कहा महानगरों में पनपती माल्स संस्कृति देश को किस ओर ले जा रही है। अच्छे बुरे के बारे में सोचने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जरूरत है अच्छे बुरे को सामने लाने की ताकि आम आदमी पर्यावरण संबंधी खतरों को समझ सके।पर्यावरणविद् सुजाय बनर्जी ने कहा जंगल स्वच्छ हवा पेयजल कृषि भूमि बढ़ती जनसंख्या और विकास सभी कहीं न कहीं आपस में जुड़े हुए हैं। इस सभी के बीच संतुलन बनाये रखने की जरूरत है।उन्होंने कहा रेगिस्तानी और परती जमीन पर भी वृक्ष लगाये जा सकते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को हम एक खूबसूरत वसुंधरा विरासत में सौंप सके। यह काम कठिन अवश्य है लेकिन नामुमकिन नहीं है।
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