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भारत को कमजोर न समझे चीन


12739इकतीस जुलाई को चीनी सेना की एक बड़ी फौजी टुकड़ी अक्साई चिन तिब्बत के रास्ते से भारत की सीमा चुमार लद्दाख में लगभग दो किलोमीटर के आस-पास घुस आई। चुमार नाम की जगह लद्दाख इलाके में भारत की सीमा के अंदर है। यह जगह विवादग्रस्त नियंत्रण रेखा पर नहीं है। यह बात भी सच है कि सीमा की हद बंदी नहीं हुई है। समय-समय पर अतिक्रमण करना चीन की आदत सी हो गई है। जनवरी 2009 से अब तक की यह पांचवीं घटना है। इतिहास में जाएं तो ज्यादा पहले नहीं करीब 50 साल पहले हम पर एक हमला भी कर चुका है। तब पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। चीन ने हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे भी खूब लगाए, लेकिन जो हुआ वह पीछे से छुरा घोंपने के समान था। यह घटनाक्रम हमे चेताता भी है।

गौरतलब है कि भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बनी समिति की बैठक हाल ही में हो चुकी है। समिति के फैसले के अनुसार दोनों देशों को यथास्थिति बनाए रखनी है तथा सीमा का उल्लंघन नहीं करना है। भारत ने कुछ दिन पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में अपील की थी कि उसे 2 अरब अमरीकी डॉलर ऋण दिया जाए ताकि वह अरूणाचल में यातायात तथा जल संसाधनों का विकास कर सके। चीन ने आईएमएफ की बैठक में इसका जबरदस्त विरोध किया। चीन का कहना था कि अरूणाचल भारत का नहीं बल्कि चीन का हिस्सा है। इसके बाद आईएमएफ से मिलने वाले ऋण को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। कहने का मतलब यह है कि चीन समय-समय पर भारत के मामले में दखल देने से बाज नहीं आ रहा है।

आश्चर्य की बात यह है कि एक ओर भारत-चीन व्यापारिक रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे हैं, दूसरी ओर भारत-चीन सम्बन्धों में खटास व कड़वाहट भी बढ़ती जा रही है। वर्ष 2007-08 में भारत व चीन के बीच में दोतरफा व्यापार पचास अरब अमरीकी डॉलर को पार कर गया है। ग्लोबल वार्मिंग तथा प्रदूषण समस्या पर भारत-चीन के विचारों में काफी समानता है। यद्यपि ये बात भी सही है कि चीन में प्रदूषण का स्तर भारत के स्तर से चार सौ प्रतिशत अधिक है। डब्लूटीओ में भी अपने किसानों को अतिरिक्त सब्सिडी देने के सवाल पर भी भारत-चीन के नजरिये में काफी समानता है। यह तो बात रही भारत-चीन के आपसी सहयोग और मित्रता की।

इसके बिल्कुल विपरीत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चीन का रवैया खुल्लमखुल्ला भारत विरोधी है। विश्व स्तर पर शीत युद्ध भले ही समाप्त हो गया हो, परन्तु भारत-चीन के बीच शीत युद्ध समाप्त होने के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। कम होने के बजाय यह शीत युद्ध निरंतर बढ़ता जा रहा है। इसके लिए मुख्य रूप से चीन जिम्मेदार है। जब-जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार और संतुलन की बात होती है और भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाने का सवाल उठता है तो चीन खुलकर इसका विरोध करता है। भारत की विदेश नीति और कूटनीति के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है कि वह किस प्रकार चीन के विरोध के बावजूद जापान, इटली, जर्मनी, फ्रांस, रूस तथा अमरीका को इसके लिए मनाए। चीन अपनी परमाणु ताकत को बराबर बढ़ाने में लगा हुआ है।

भारत की तुलना में चीन का परमाणु हथियारों का भंडार और उनका प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम गुणात्मक रूप से बहुत बड़़ा है। चीन ने पाकिस्तान, उत्तर कोरिया तथा ईरान को परमाणु तकनीक परमाणु शस्त्र दिए। चीन का रक्षा बजट भारत के रक्षा बजट से साढ़े तीन सौ प्रतिशत (2006-07) अधिक है। अमरीका के बाद चीन विश्व का दूसरा देश है जो हथियारों का सौदागर है। दुनिया में लगभग 53 देश हैं, जिनको चीन लगातार हथियार बेच रहा है। भारत के दक्षिण एशिया में एक बड़ी प्रबुद्ध शक्ति के रूप में उभरने का चीन पूरी ताकत से विरोध कर रहा है। भारत की उभरती शक्ति को रोकने के लिए चीन ने भारत की घेराबंदी करने की नीति अपनाई है। पाकिस्तान को फौजी और परमाणु मदद, म्यांमार की जमीन पर चीनी अड्डे तथा म्यांमार को शक्तिशाली हथियार बेचने व दान में देने की नीति, नेपाल में चीनी प्रभाव बढ़ाने के प्रयास इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। भारत-अमरीका परमाणु सौदे का चीन ने पुरजोर विरोध किया। चीन नहीं चाहता कि भारत-अमरीका सम्बन्धों में गुणात्मक सुधार हो।

भारत-चीन के सम्बन्ध स्पष्ट और सापेक्ष होने चाहिए। चीन को यह फैसला करना होगा कि भारत के साथ उसे मित्रता के सम्बन्ध चाहिए या शत्रुता के। मित्रता व आपसी सद्भावना दोनों देशों के हित में है। दोनों देश गरीबी, बेरोजगारी, भूख तथा बीमारी के खिलाफ लड़ रहे हैं। मित्रता से दोनों को लाभ होगा। भारत-चीन सम्बन्धों में खटास, कटुता तथा शत्रुता से दोनों को नुकसान होगा। चीन इतना शक्तिशाली नहीं है और भारत इतना कमजोर नहीं है कि चीन भारत के अस्तित्व को समाप्त कर पाए। चीन की दादागिरी अवांछनीय तथा अनैतिक है। सवाल सीमा पर अतिक्रमण का नहीं है, सवाल एशिया की शांति और दोनों देशों के लिए फलने-फूलने का है।

प्रो. काशीराम शर्मा
[लेखक चीन मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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