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हिन्दुत्व की आवश्यकता सम्पूर्ण विश्व को – डॉ मोहन भागवत

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जयपुर 25 अक्तूबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्र भक्तों से आवाहन किया है कि वे अपने घरों से संघ को समझने की बजाय संघ की शाखा में आकर संघ के कार्यकर्ता बनें क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक अवचेतना का मूल केन्द्र हिन्दुत्व की को पूरे विश्व को आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा। मोहन राव भागवत ने कहा कि संघ कार्य चीनी की उस मिठास की तरह है जिसे चखे बिना उसके स्वाद का ज्ञान नहीं हो सकता। वे रविवार को चित्रकूट स्टेडियम में आयोजित हिन्दू सम्मेलन में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व हमारे देशात्म बोध की अन्तश्चेतना है। यह वह तत्व है जो दुनिया और देश में व्याप्त समस्याओं का एक मात्र समाधान प्रस्तुत करता है।
उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक डा। केशव बलिराम हेडगेवार ने आजादी के लिए चलाए जा रहे आन्दोलनों व उनके नेताओं से व्यापक विचार विमर्श करने के बाद ही संघ की स्थापना इस विचार के साथ की थी कि यदि देश को मजबूत बनाना है तो समाज में चरित्र निर्माण करना होगा। उन्होंने कहा कि संघ की स्थापित मान्यता है कि जब तक देश के नागरिकों में देशात्मक बोध की चेतना का जागरण नहीं होगा तब तक देश परम वैभवशाली नहीं होगा। इसके लिए देश की चेतना के लिए सामान्य पुरूष यानी कि जनता को जगाना होगा। तभी देश आगे बढ़ेगा। भारत शक्तिशाली बने और भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया भर में फैले इसकी जरूरत पूरी दुनिया को है।
श्री भागवत ने कहा कि दुनिया भर के चिन्तक पृथ्वी के नष्ट हो जाने की चिन्ता से ग्रस्त हैं। किसी को ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया नष्ट होने की तो किसी को दुनिया में फैल रहे कट्टरपन की। सरसंघचालक ने कहा कि इन दोनों ही समस्याओं का समाधान भारतीय संस्कृति हिन्दुत्व में है। सबको साथ लेकर चलने की प्रकृति वसुदेव कुटुम्ब का आचरण, विभिन्नता की स्वीकार्यता इसी संस्कृति की विशेषता है और यही संस्कृति देश की पहचान है। उन्होंने कहा कि यही संस्कृति विज्ञान के विकास के साथ यह सिखाती है कि प्रकृति से कितना लेना है। यह कला हमारे पास वर्षों पुरानी है। एक सर्वे का जिक्र करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि डीएनए मैपिंग बताता है कि 40 हजार वर्ष पूर्व हम सभी एक थे। यानि विश्व भर में प्रचलित सभी विचार और व्यक्ति एक ही जगह उत्पन्न हुई है। देश में हुए अब तक विभाजन का उदाहरण देते हुए सरसंघचालक ने कहा कि जहां भी हिन्दू जनसंख्या और विचारों का लोप हुआ है वहां देश को विभाजन झेलना पडा है।
श्री भागवत ने कहा कि दुनिया भर के चिन्तक पृथ्वी के नष्ट हो जाने की चिन्ता से ग्रस्त हैं। किसी को ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया नष्ट होने की तो किसी को दुनिया में फैल रहे कट्टरपन की। सरसंघचालक ने कहा कि इन दोनों ही समस्याओं का समाधान भारतीय संस्कृति हिन्दुत्व में है। सबको साथ लेकर चलने की प्रकृति वसुदेव कुटुम्ब का आचरण, विभिन्नता की स्वीकार्यता इसी संस्कृति की विशेषता है और यही संस्कृति देश की पहचान है। उन्होंने कहा कि यही संस्कृति विज्ञान के विकास के साथ यह सिखाती है कि प्रकृति से कितना लेना है। यह कला हमारे पास वर्षों पुरानी है। एक सर्वे का जिक्र करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि डीएनए मैपिंग बताता है कि 40 हजार वर्ष पूर्व हम सभी एक थे। यानि विश्व भर में प्रचलित सभी विचार और व्यक्ति एक ही जगह उत्पन्न हुई है। देश में हुए अब तक विभाजन का उदाहरण देते हुए सरसंघचालक ने कहा कि जहां भी हिन्दू जनसंख्या और विचारों का लोप हुआ है वहां देश को विभाजन झेलना पडा है।

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