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आजादी की लड़ाई का महायोद्धा – कुंवर सिंह


‘गनीमत रही कि 1857 की गदर के समय कुंवर सिंह की उम्र अस्सी साल थी। अगर वो जवान होते तो अंग्रेजों को उसी वक्त भारत छोड़ना पड़ता।’ ब्रिटिश इतिहासकार होम्स की ये पंक्तियां आजादी की पहली लड़ाई के महायोद्धा बाबू कुंवर सिंह के ‘होने’ को ठीक-ठीक व्याख्यायित करती हैं।
इन पंक्तियों में आजादी की दीवानगी की वह आग है जो कभी इस बूढ़े शेर की आंखों में हुआ करती थी। पर अफसोस अपने किये के मुताबिक कुंवर सिंह इतिहास में वो जगह नहीं पा सके जिसके हकदार थे। लोक स्मृतियों में दर्ज कुंवर सिंह की वीरता के किस्से सुनने के बाद ऐसा ही लगता है। ऐसे में इतिहास के पन्नों और लोक जीवन में रची-बसी कुंवर सिंह की वीरता की दास्तान में बड़ा असंतुलन नजर आता है।
बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर में 23 अप्रैल 1777 को पैदा हुए थे कुंवर सिंह। पिता साहबजादा सिंह जगदीशपुर रियासत के जमींदार थे। सम्राट विक्रमादित्य के वंश में जन्म लेने वाले कुंवर सिंह को बचपन से ही तीरंदाजी, घुड़सवारी और बंदूक चलाने का शौक था। हालांकि इनकी जमींदारी बिहार की बड़ी रियासतों में शुमार नहीं थी, तब तीन लाख रूपये सालाना की आय थी। इसमें से आधी रकम अंग्रेजी हुकूमत के हिस्से चली जाती थी। पिता ही की तरह अपनी रियाया का खून चूसकर अंग्रेजों का खजाना भरना कुंवर सिंह को गवारा नहीं था।
लगान वसूली न होने के चलते उन पर तेरह लाख रूपये का सरकारी कर्ज हो गया। अंग्रेजों के अत्याचार और उनकी हड़प नीति ने कुंवर सिंह को अंदर तक हिला दिया। बचपन से ही बगावती मिजाज के कुंवर सिंह ने 1845-46 आते-आते अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति का ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया। अंग्रेजों को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने एक चाल चली। 1855-56 में कर्ज में डूबे होने की दलील पर उनकी जमींदारी सरकारी राज्य प्रबंध के तहत ले ली गयी।
1857 में जमींदारी को राज्य प्रबंध से मुक्त कर दिया गया और एक माह के भीतर मालगुजारी की रकम अदा करने का आदेश दिया गया। ऐसा इसलिए ताकि कुंवर सिंह कर्ज अदायगी के बंदोबस्त में उलझ जाएं और विद्रोह की तैयारियां ठंडी पड़ जाएं। हालांकि 1857 के प्रथम मुक्ति संग्राम को स्वार्थों के निमित्त कुछ भारतीय शासकों द्वारा लड़ी गयी लड़ाई बताने वाले विद्वान इस कोण से कुंवर सिंह को भी देखते हैं पर यह भूल कर कि अंग्रेजों के खिलाफ होने वाली लड़ाई के लिए कर्ज में डूबे कुंवर सिंह ने चंदा दिया था। यदि स्वार्थ ही सर्वोपरि होता तो वह उन अंग्रेजों के खिलाफ बगावत पर क्यों उतरते जिनके कब्जे में उनकी पूरी जमींदारी फंस चुकी थी। जगदीशपुर पर अंग्रेजों ने कब्जा जमा लिया था। निरक्षर कुंवर सिंह को उचित-अनुचित का फर्क पता था।
तभी तो 1857 के विद्रोह में वे राजाओं, जमींदारों के साथ ही आम जन की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने देश के सैकड़ों जमींदारों और राजघरानों को लड़ाई का न्योता भेजा। यह और बात है कि उनका साथ कुछ छोटे-मोटे जमींदारों ने ही दिया पर अपने उदार व्यक्तित्व, नेक इरादों और लोकप्रियता की बदौलत आम जन का उन्हें इतना बड़ा सहयोग मिला कि वे 1857 की गदर के पर्याय बन गये। दुनिया के इतिहास में अस्सी साल के लड़ाके की दास्तान नहीं; ऐसा नहीं कहा जा सकता। कुंवर सिंह इसकी इकलौती अप्रतिम मिसाल हैं। जिस उम्र में इंसान का एक पैर कब्र में होता है उस उम्र में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की कब्र खोदने का काम किया। तकरीबन एक साल तक कालपी से कानपुर और ग्वालियर से लखनऊ तक घोड़े पर सवार आजादी का यह दीवाना क्रांति की मशाल जलाता रहा।
लगातार लड़ता रहा और अंग्रेजी फौज को धूल चटाता रहा। इस बूढ़े राजपूत शासक की तलवार गोरी गर्दनों के खून की प्यासी बन चुकी थी। और अंग्रेजों की उन्हें पकड़ने की तमाम कोशिशें असफल हुईं। इन्हीं कोशिशों के क्रम में फैजाबाद, आजमगढ़, गाजीपुर होते हुए उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के शिवपुर घाट से गंगा पार कर जगदीशपुर लौट रहे कुंवर सिंह और उनकी सेना पर अंग्रेजों ने हमला कर दिया। इस हमले में उनकी बांह में गोली लग गयी। अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति कुंवर सिंह ने अपनी ही तलवार से अपनी बांह काट गंगा को यह कहकर अर्पित कर दी कि गोरी गोली से यह अपवित्र हो गयी है और इसे तू ही पवित्र करेगी। कुंवर सिंह इसी हाल में 22 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर पहुंचे। अंग्रेजों ने यहां भी हमला किया और एक बांह के हो चुके कुंवर सिंह ने मोर्चा संभाल लिया। डेढ़ सौ में से सौ अंग्रेज सिपाही मारे गये, हमले का नेतृत्व कर रहा अंग्रेज अफसर ली ग्रांड भी और 23 अप्रैल को कुंवर सिंह का जगदीशपुर पर पुन: कब्जा हो गया।
यहां इस तिथि को आज भी ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। हालांकि अगले एक-दो दिनों के अंदर ही लड़ते-लड़ते चूर हो चुका यह ‘बूढ़ा जवान’ मौत की आगोश में समा गया (इतिहासकारों में कुंवर सिंह की मृत्यु तिथि को लेकर मतैक्य नहीं। कोई इसे 24 तो कोई 26 अप्रैल बताता है)। पर आंखें जब बंद हुईं तब भी जगदीशपुर में स्वतंत्रता का परचम लहरा रहा था ।

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