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संस्कृत ज्ञान की गंगोत्री

संस्कृत ज्ञान की गंगोत्री

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बेंगलूरू ।संस्कृत भाषा ज्ञान की गंगोत्री है। यह भारत की प्रज्ञा का सजीव स्वरूप है। यह विचार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल “निशंक” ने व्यक्त किए। शुक्रवार को नेशनल कॉलेज मैदान में विश्व संस्कृत पुस्तक मेले के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा कि संस्कृत संस्कृति व संस्कारों की भाषा है। विश्वबंधुत्व की प्रेरक, “सर्वे संतु निरामया” का संदेश देनेवाली ऎसी समृद्ध भाषा को जन-जन तक पहुंचाना हमारा सामाजिक दायित्व है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा अब विश्व की धरोहर बन गई है। संस्कृत के प्रति बढ़ती चेतना देखकर देश में स्वाभिमान जगने की आहट सुनाई दे रही है। वह दिन दूर नहीं, जब संस्कृत की ज्ञानरूपी गंगा देश के तनमन को शुध्द कर देगी।

उत्तराखंड से संस्कृत का पुनरोत्थान

उन्होंने रामायण के एक प्रसंग का जिक्र करते हुए कहा कि मूर्छित लक्ष्मण को बचाने के लिए हनुमान हिमालय से संजीवनी लाए थे, उसी उत्तराखंड से देश की सांस्कृतिक चेतना के लिए संस्कृत भाषा की संजीवनी मिल रही है। देश में पहली बार उत्तराखंड ने संस्कृत को दूसरी राजभाषा का स्थान देकर डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सपने को साकार किया है। इसके अलावा हरिद्वार व ऋषिकेश को संस्कृत नगरी घोषित किया है। जहां पर जन सामान्य को संस्कृत भाषा सिखाई जा रही है। देवभूमि, वेद पुराणों की धरती उत्तराखंड से संस्कृत का पुनरोत्थान गौैरव का विषय है।

मुख्यमंत्री बी. एस. येडि्डयूरप्पा ने कहा कि सरकार स्थानीय कन्नड़ भाषा के साथ संस्कृत भाषा के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए सरकार हरसंभव सहायता कर रही है। संस्कृत का अध्ययन करनेवालों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

उच्चतम न्यायालय के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्वप्रधान न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलय्या ने आयोजक संस्कृत भारती की सराहना करते हुए कहा कि संस्कृत पुस्तक मेले का आयोजन साहसी कार्य है। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर जहां विश्व की अन्य भाषाओं के एक सौ बिलियन दस्तावेज मौजूद हैं वही भारतीय भाषाओं के मात्र दो मिलियन दस्तावेज मौजूद हैं।

प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिले

संस्कृत भाषा के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय प्रतिभाएं आगे आएं इसके लिएअच्छी छात्रवृत्ति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्ष 1949 में डॉ अम्बेडकर ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था जिसका विरोध बीपी मौर्य ने किया था। बाद में मौर्य ने इस विरोध पर पश्चाताप जताते हुए कहा था कि इस विरोध के कारण ही समाज का बहुत बड़ा तबका संस्कृत से दूर रहा।

इस अवसर पर उद्यमी दयानंद पै, मुख्य सचिव एस.वी. रंगनाथ, डॉ. वाचस्पति उपाध्याय, डॉ. पंकज चांदे, डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी, डा.ॅ कुटुंब शास्त्री, डॉ. हरेकृष्णा आदि शतपथी उपस्थित थे.

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