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“हम आरएसएस कैंप पर वार करेंगे”: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की धमकी

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक बार फिर भारतीय संगठन आरएसएस के शिविरों पर हमले की धमकी देते हुए भाषा‑युद्ध को और तीखा कर दिया है। उनका दावा है कि अगर भारत सीमा पार कार्रवाई या गलत‑झंडा ऑपरेशन की कोशिश करेगा, तो पाकिस्तान “आरएसएस कैंपों समेत” भारत के भीतर लक्ष्य बना सकता है। लेकिन इसी समय यह भी साफ करना जरूरी है कि आरएसएस की जमीनी वास्तविकता और उसकी कार्यप्रणाली इस तरह की धमकियों से कितनी अलग है, और उसकी शाखा प्रणाली आखिर क्या करती है।

आरएसएस क्या है: संस्कृति और राष्ट्र‑निर्माण का संगठन
आरएसएस, जिसका पूरा नाम “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” है, खुद को एक सांस्कृतिक और राष्ट्र‑निर्माण संगठन बताता है, न कि धार्मिक या आतंकी संगठन। इसकी स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी, जिनका उद्देश्य उस दौर की बिखरी हुई “हिंदू समुदाय इकाई” को सँभालकर राष्ट्र की रक्षा और आत्म‑निर्भरता की नींव रखना था। आरएसएस का दावा यह है कि यह भारतीय संस्कृति, हिंदू‑संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और “चरित्र‑निर्माण” के क्षेत्र में काम करता है, न कि किसी विशेष धर्म की विदेशी शक्तियों या आतंकी नेटवर्क जैसी गतिविधि से जुड़ होता है।


आरएसएस की शाखाएं: एकता, अखंडता, राष्ट्रवाद और देशभक्ति की फैक्ट्री
आरएसएस की बुनियाद उसकी शाखा प्रणाली पर टिकी है, जो देश भर में शहरों, गांवों, स्कूलों और कॉलेजों के चौक–बाजारों से लेकर ग्रामीण छोटे‑छोटे मैदानों तक फैली हुई है। प्रत्येक शाखा में स्वयंसेवक सुबह–शाम एकत्र होकर व्यायाम, नियमित चलने‑दौड़ने, ड्रिल, सामूहिक गान और विचार विमर्श के माध्यम से एकता, अखंडता, राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना को संगठित करते हैं। यहां ज्यादा जोर अनुशासन, टीमवर्क, स्व‑संयम और सामूहिक जिम्मेदारी पर होता है, न कि किसी व्यक्तिगत लाभ या धार्मिक विवाद पर। इस तरह आरएसएस की शाखाएं अपने अंदर एक ऐसा वातावरण बनाती हैं, जहां युवा लोग जाति, धर्म, क्षेत्र या भाषा के अंतरों से ऊपर उठकर “राष्ट्र के लिए एकजुट नागरिक” के रूप में सोचने की आदत बनाते हैं।


आरएसएस की शाखा कैसे काम करती है?
आरएसएस की प्रत्येक शाखा एक छोटे‑से बैठक‑स्थल या ओपन मैदान में चलती है, जहां स्वयंसेवक सुबह या शाम को लंगोट या साधारण धोती‑कुर्ते जैसी साधारण वस्त्र पहनकर खड़े होते हैं। यहां उनका दिन इस तरह बीतता है:
शारीरिक व्यायाम, ड्रिल और टीम‑बेस्ड खेल के जरिए शारीरिक फिटनेस और अनुशासन का विकास।
छोटे निबंध, विचार‑विनिमय और चर्चा के माध्यम से राष्ट्र‑भावना, भारतीय इतिहास, संस्कृति और नैतिक मूल्यों को मन‑तक पहुंचाना।
सामुदायिक कार्यों, आपदा‑प्रबंधन, स्वच्छता अभियान, गरीबों की मदद और स्थानीय समस्याओं के समाधान में भागीदारी के जरिए “सेवा की भावना” को बढ़ाना।
इस तरह आरएसएस की शाखाएं सिर्फ बैठकजन्य संस्थाएं नहीं, बल्कि रोज‑मर्रा की सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय भावना के अभ्यास के केंद्र बन जाती हैं, जहां स्वयंसेवक खुद‑से लेकर आसपास के समाज तक जिम्मेदारी लेना सीखते हैं।


आरएसएस: व्यक्ति‑निर्माण की “फैक्ट्री”
आरएसएस की जमीनी ताकत उसकी “व्यक्ति‑निर्माण” वाली सोच पर है। इसे अक्सर “व्यक्ति‑निर्माण की फैक्ट्री” कहा जाता है, क्योंकि यहां जोर सीधे‑सीधे राजनीति या धर्म‑घर बदलने पर नहीं, बल्कि चरित्र, अनुशासन, दृढ़ता और राष्ट्र‑भावना पर होता है। एक स्वयंसेवक जब शाखा में सालों तक लगातार आता है, तो उसके अंदर एक ऐसा आत्मविश्वास, सामाजिक जागरूकता और देश‑प्रेम विकसित होता है, जो बाद में उसके व्यक्तिगत जीवन, पेशा, राजनीति या सामाजिक कार्य दोनों में झलकता है। इस तरह आरएसएस की शाखाएं न केवल युवाओं को शारीरिक‑मानसिक रूप से मजबूत बनाती हैं, बल्कि उन्हें स्वयं‑अनुशासित, देश‑प्रेमी और अखंडता वाला नागरिक बनाने की कोशिश करती हैं।


आरएसएस और इस्लामिक आतंकवादी संगठनों में बड़ा अंतर
इसी वजह से आरएसएस को वैसे इस्लामिक या अन्य धार्मिक आधारित आतंकी संगठनों जैसा नहीं रखा जा सकता, जो गुप्त कैंपों में हथियार‑प्रशिक्षण, बारूद और आतंक‑वार पर केंद्रित रहते हैं। आरएसएस की शाखाएं खुले मैदानों, खुले चौराहों, ग्राम‑समाजों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास चलती हैं, जहां उनकी सार्वजनिक गतिविधियां देखी जा सकती हैं, न कि किसी गुप्त टनल या दुर्गम जंगलों में सुरक्षित आतंकी ठिकानों जैसा आवरण रखा जाता हो। आरएसएस की विचारधारा हिंदू‑केंद्रित राष्ट्रवाद पर टिकी हो सकती है, लेकिन उसकी शाखाएं राजनीतिक‑पक्षपात या हथियारबंद युद्ध की बजाय शिक्षा, सेवा और व्यक्ति‑निर्माण की दिशा में काम करती हैं।

आरएसएस और राजनीति: सीधा या अप्रत्यक्ष भूमिका?
आरएसएस खुद को गैर‑राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन बताता है, क्योंकि यह अपने नाम से चुनाव नहीं लड़ता, न ही पार्टी बनाता है। लेकिन व्यवहार में यह एक विस्तृत “संघ परिवार” का केंद्र है, जिसके अंतर्गत राजनीति, शिक्षा, श्रम, कानून, सामाजिक सेवा और संस्कृति से जुड़े कई संगठन मौजूद हैं, जैसे भाजपा, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, आरएसएस‑संबद्ध शिक्षा संस्थाएं आदि। इस संरचना के कारण कई विश्लेषक मानते हैं कि आरएसएस राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं है, लेकिन यह राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि राजनीतिक‑प्रभाव वाला आंदोलन‑स्तरीय नेटवर्क है। इसकी शाखाएं अधिकतर शहरों, गांवों और शिक्षण संस्थानों में मौजूद हैं, जिनका काम आम तौर पर युवा‑प्रशिक्षण, सामुदायिक कार्यक्रम और आपदा‑प्रबंधन जैसी गतिविधियों से जुड़ा माना जाता है, न कि हथियारबंद गुप्त ऑपरेशन से।


भारत की दृष्टि से आसिफ की धमकी
इसलिए पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की आरएसएस के शिविरों पर हमले की धमकी न केवल आवेगपूर्ण और राजनीतिक‑प्रोपेगेंडा वाली है, बल्कि वास्तविकता से भी दूर है। भारतीय अधिकारी और विश्लेषक इसे एक ऐसी जुबानी जंग बताते हैं, जिसका उद्देश्य दुनिया के सामने भारतीय संस्थाओं को आतंकी‑स्तरीय बताकर भारत को नकारात्मक रोशनी में रखना है। उधर, आरएसएस की शाखाएं चुपचाप अपना काम करती रहती हैं – एकता, अखंडता, राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना को मजबूत करना, युवाओं को व्यक्ति‑निर्माण की दिशा में बढ़ावा देना, और आसपास के समाज में सकारात्मक बदलाव की आधारशिला बनाना। इस तरह ख्वाजा आसिफ की नई धमकी न केवल भारत‑पाक तनाव को और तेज कर रही है|

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