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सनातन विरोधी डीएमके का ‘मंदिर मोह’: उदयनिधि स्टालिन समेत नेता पूजा-पाठ में रंगे, वोट बैंक बचाने की चाल!

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के ठीक पहले डीएमके नेताओं पर ‘हिंदुत्व का डबल गेम’ चलने का आरोप लगा है। सनातन धर्म को ‘मलेरिया’ जैसे रोग बताने वाले नेता अब मंदिरों में पूजा-अर्चना कर रहे हैं। पंचजन्य की रिपोर्ट के अनुसार, यह ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति है, जिसका मकसद हिंदू वोट बैंक को मजबूत करना है। डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन समेत कई बड़े नाम इस ‘उलटफेर’ में शामिल हैं।

पिछले साल उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को समाप्त करने की बात कही थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फटकार लगाई। लेकिन अब चुनावी हवा देखते ही वे तिरुपति बालाजी मंदिर पहुंचे और पूजा की। इसी तरह, डीएमके के अन्य नेता मीनाक्षी मंदिर, मदुरै में हलंदी उत्सव में शरीक हो रहे हैं। पंचजन्य ने खुलासा किया कि यह सुनियोजित अभियान है, जहां ‘अंदर से हिंदुत्व विरोध, बाहर से दिखावा’ चल रहा है।


उदयनिधि से लेकर अन्य नेताओं का ‘पूजा परिवर्तन’
उदयनिधि स्टालिन का मामला सबसे चर्चित है। सनातन को ‘धर्म नहीं, बीमारी’ बताने के बाद वे अब तमिलनाडु के प्रमुख मंदिरों में दर्शन कर रहे हैं। हाल ही में वे चिदंबरम नटराज मंदिर गए, जहां उन्होंने विशेष पूजा कराई। डीएमके के वरिष्ठ नेता दुरईमुरुगन ने कहा, “हमारी संस्कृति का सम्मान करते हैं,” लेकिन आलोचक इसे वोट की राजनीति बता रहे हैं।


पंचजन्य की रिपोर्ट में दर्जनों फोटो और वीडियो हैं, जो दिखाते हैं कि डीएमके विधायक तमिलनाडु के 10 प्रमुख मंदिरों में सक्रिय हैं। कनिमोझी ने तिरुनेलवेली के नेल्लईअप्पर मंदिर में अभिषेक कराया, जबकि पार्टी के युवा नेता रामकुमार कोयंबटूर के मरूदमलाई मंदिर में देखे गए। यह बदलाव 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की मजबूती के बाद शुरू हुआ, जब डीएमके को हिंदू वोटों का नुकसान हुआ।


‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राजनीतिक चालबाजी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ डीएमके की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने खुद कहा, “हम द्रविड़ संस्कृति के रक्षक हैं, लेकिन सभी धर्मों का सम्मान करते हैं।” लेकिन आलोचक इसे ‘हिंदू-विरोधी छवि’ सुधारने की कोशिश बताते हैं। भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने ट्वीट किया, “जिन्होंने सनातन को गाली दी, वे अब मंदिरों में झुक रहे हैं। वोट के लिए कुछ भी!”


तमिलनाडु में 88% हिंदू आबादी है, और डीएमके को लंबे समय से ‘एंटी-हिंदू’ टैग झेलना पड़ा है। 2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुद्दे पर 11 सीटें जीतीं। अब 2026 चुनावों में डीएमके गठबंधन को चुनौती मिल रही है। पंचजन्य के अनुसार, पार्टी ने आंतरिक निर्देश जारी किए हैं कि नेता मंदिरों में सक्रिय रहें, लेकिन सोशल मीडिया पर पुरानी आलोचना न दोहराएं।


वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश, लेकिन सवाल बरकरार
यह रणनीति अल्पकालिक सफल हो सकती है, लेकिन लंबे में डीएमके की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही है। आरएसएस से जुड़े संगठन इसे ‘पाखंड’ बता रहे हैं। जनता कांग्रेस की तमिलनाडु इकाई ने कहा, “सनातन खत्म करने की बात करने वाले अब पूजा क्यों?” वहीं, डीएमके समर्थक इसे ‘समावेशी राजनीति’ का नाम दे रहे हैं, चुनाव आयोग के आंकड़ों से साफ है कि हिंदू वोटरों में बदलाव आ रहा है। 2026 चुनावों में यह ‘मंदिर रणनीति’ डीएमके के लिए गेम-चेंजर साबित होगी या नहीं, समय बताएगा। लेकिन सनातन धर्म के प्रति उनके दोहरे चरित्र पर बहस तेज हो गई है।

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