लेह, लद्दाख के कुछ निवासियों ने ईरान युद्ध पीड़ितों के लिए दान अभियान चलाया, जिसमें एक साधारण अंडे की नीलामी 25,000 रुपये में हो गई। अंजुमन इमामिया लेह और मजलिस-ए-उलेमा जैसे संगठनों ने नकदी, आभूषण और सामान इकट्ठा कर ‘एकजुटता’ दिखाई। लेकिन सवाल उठता है – दिल्ली बम धमाके में मारे गए निर्दोष भारतीयों के लिए ये कहाँ थे? ये वही लोग हैं जो भारत के खिलाफ होते हैं, लेकिन विदेशी संकट में सबसे आगे खड़े नजर आते हैं।
यह घटना भारतीय समाज में व्याप्त पाखंड को उजागर करती है। लेह के शबीब हुसैन ने कहा कि अंडे की कीमत 10 रुपये है, लेकिन 25,000 देकर ईरान के बच्चों के लिए संदेश देना चाहते हैं। लाखों रुपये का दान इकट्ठा हो गया, लेकिन जब दिल्ली में बम विस्फोट से दर्जनों निर्दोष मारे गए, तब ये संगठन चुप थे। पहलगाम हमले में कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार हुआ, तो सोशल मीडिया पर नारेबाजी हुई लेकिन दान-पुण्य का कोई अभियान नहीं चला। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय सेना ने आतंकवादियों को सबक सिखाया, तब ये ‘शांति’ की दुहाई देने लगे।
पाखंड का इतिहास: भारत के दर्द पर चुप्पी, विदेशी दुख में दौड़
ये लोग हमेशा चुनिंदा मानवता दिखाते हैं। पुलवामा हमले में 40 जवान शहीद हुए, तो बांग्लादेश-ईरान के लिए दान अभियान चले लेकिन शहीद परिवारों के लिए चुप्पी। मणिपुर हिंसा में हजारों विस्थापित हुए, लेकिन लेह-कर्गिल जैसे इलाकों से ईरान के लिए करोड़ों इकट्ठे हो गए। ऑपरेशन सिंदूर, जो भारत की सैन्य सफलता थी, पर ये तंज कसते रहे। दिल्ली के हालिया बम धमाके में ‘एंटी-नेशनल फोर्सेस’ का हाथ था, लेकिन इन ‘मानवतावादियों’ की जुबान लकवाग्रस्त हो गई। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो दिखाते हैं कि ईरान के लिए आंसू बहाते हैं, लेकिन कश्मीर के हिंदुओं के दर्द पर आंखें बंद।
ये पाखंडी भारत के लिए बोझ हैं। वे विदेशी एजेंडा चलाते हैं, भारत की आलोचना करते हैं लेकिन खुद की सुरक्षा के लिए यहीं रहते हैं। एनआरआई हो या स्थानीय संगठन – ईरान, फिलिस्तीन के लिए चंदा इकट्ठा करते हैं, लेकिन दिल्ली, मुंबई बम धमाकों के शिकारों के लिए कुछ नहीं। यह दोहरी नैतिकता राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है। जब देश आत्मरक्षा करता है, तो ये ‘शांति’ चिल्लाते हैं। पहलगाम जैसे हमलों पर चुप्पी उनकी सच्चाई बयां करती है।
राष्ट्रीय हितों पर सवाल: ये भारत के शत्रु या मित्र?
ऐसे अभियान राजनीतिक रूप से प्रेरित लगते हैं। लेह में शिया बहुल इलाके ईरान से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, लेकिन भारत के खिलाफ खड़े होने का इतिहास रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के समय जब पाकिस्तान को जवाब दिया गया, तब विरोध प्रदर्शन हुए। दिल्ली बम धमाके पर जब एनआईए ने पाक लिंक पकड़ा, तो ये संगठन जांच पर सवाल उठाने लगे। ये लोग ‘मानवता’ का ढोंग करते हैं लेकिन भारत के खिलाफ आतंकी साजिशों पर मौन रहते हैं। समाज को ऐसे पाखंड से सावधान रहना होगा। असली एकजुटता भारत के लिए होनी चाहिए, न कि दुश्मन देशों के लिए।
भारत सरकार को ऐसे दान अभियानों पर नजर रखनी चाहिए। ये न केवल हिपोक्रेसी दिखाते हैं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा कर सकते हैं। समय है कि समाज ‘शत्रु बोध’ जागृत करे और असली देशभक्तों को पहचाने।
#WATCH | Leh, Ladakh: People of Leh district give different types of donations for Iran victims. During this, one egg was auctioned for Rs 25 thousand.
— ANI (@ANI) April 5, 2026
A local resident, Shabir Hussain, says, "… Everyone knows that the price of an egg is Rs 10. I didn't pay Rs 25 thousand… pic.twitter.com/yGSD4NVXRc