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मदन लाल ढींगरा शहादत का शताब्दी वर्ष दिवस

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देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए सिर्फ भारत में ही लड़ाई नहीं लड़ी गई बल्कि उस समय ब्रिटेन में रहने वाले बहुत से भारतीय भी अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़े हुए थे। इनमें से ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे मदन लाल ढींगरा जिन्होंने मातृभूमि की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए आज से 100 साल पहले ब्रिटेन में ही एक ब्रिटिश अधिकारी को गोली से उड़ा दिया और फिर हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।

सन 1883 में पंजाब के एक संपन्न परिवार में जन्मे मदनलाल ढींगरा द्वारा ब्रिटेन में किए गए जंग ए आजादी के ऐलान को 20वीं शताब्दी की क्रांति की प्रथम घटनाओं में से एक माना जाता है । उनका परिवार ब्रिटिश शासन का समर्थक था लेकिन इसके बावजूद ढींगरा के मन में आजादी हासिल करने का जुनून भरा था। इस कारण उनके परिवार ने उन्हें अपने से अलग कर दिया।
उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से उन्हें लाहौर कॉलेज से भी निकाल दिया गया। इसके बाद वह क्लर्क के रूप में काम करने लगे।विपरीत हालात के चलते उन्हें तांगा चलाने जैसा काम तक करना पड़ा। बाद में उनके बड़े भाई तथा इंग्लैण्ड में रहने वाले कुछ राष्ट्रवादियों ने उनकी मदद की और इस तरह 1906 में वह यांत्रिक अभियांत्रिकी की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए। उन्हें वहां के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला मिल गया।
लंदन में वह विनायक दामोदर सावरकर और श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे कट्टर देशभक्तों के संपर्क में आए। सावरकर ने उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। ढींगरा अभिनव भारत मंडल के सदस्य होने के साथ ही इंडिया हाउस नाम के संगठन से भी जुड़ गए जो भारतीय विद्यार्थियों के लिए राजनीतिक गतिविधियों का आधार था। इस दौरान सावरकर और ढींगरा के अतिरिक्त ब्रिटेन में पढ़ने वाले अन्य बहुत से भारतीय छात्र भारत में खुदीराम बोस कनानी दत्त सतिंदर पाल और कांशीराम जैसे देशभक्तों को फांसी दिए जाने की घटनाओं से तिलमिला उठे और उन्होंने बदला लेने की ठानी।
एक जुलाई 1909 को इंडियन नेशनल एसोसिएशन के लंदन में आयोजित वाषिर्क दिवस समारोह में बहुत से भारतीय और अंग्रेज शामिल हुए। ढींगरा इस समारोह में अंग्रेजों को सबक सिखाने के उद्देश्य से गए थे। अंग्रेजों के लिए भारतीयों से जासूसी कराने वाले ब्रिटिश अधिकारी सर कर्जन वाइली ने जैसे ही हाल में प्रवेश किया तो ढींगरा ने रिवाल्वर से उस पर चार गोलियां दाग दीं। कर्जन को बचाने की कोशिश करने वाला पारसी डॉक्टर कोवासी ललकाका भी ढींगरा की गोलियों से मारा गया।
बाद में ढींगरा को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर 23 जुलाई 1909 को बेली कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। अदालत में उन्होंने कहा कि उन्हें कर्जन वाइली को मारने का कोई अफसोस नहीं है क्योंकि वह भारत में राज कर रहे अमानवीय ब्रिटिश शासन की मदद करता था। ढींगरा को इस मामले में फांसी की सजा सुनाई गई। फैसले के बाद उन्होंने कहाकि देश के लिए अपने जीवन का बलिदान करते हुए मुझे गर्व है। इस महान क्रांतिकारी को 17 अगस्त 1909 को फांसी पर लटका दिया गया। फांसी पर चढ़ाए जाते समय उनके चेहरे पर डर का कोई भाव नहीं था और वह हंसते-हंसते फंदे पर झूल गए।
ढींगरा पर पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया गया । ब्रिटिश सरकार ने उन्हें वकील तक मुहैया नहीं कराया।

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