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अल्‍पसंख्‍यक आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिया झटका

नई दिल्ली/हैदराबाद. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए बुधवार को अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण से संबंधित उसकी याचिका खारिज कर दी। सरकार ने याचिका में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसके तहत धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित 4.5 प्रतिशत आरक्षण रद्द कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की पीठ ने कहा कि दिसम्बर 2011 में आधिकारिक ज्ञापन के जरिए ओबीसी के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण धार्मिक अल्पसंख्यकों को देना संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने सरकार से पूछा कि क्या वह धर्म के आधार पर आरक्षण दे सकती है।
केंद्र सरकार ने 22 दिसम्बर, 2011 को अल्पसंख्यकों के लिए नौकरियों में और आईआईटी जैसे केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण में आरक्षण देने के लिए एक आधिकारिक ज्ञापन जारी किया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आधिकारिक ज्ञापन का कोई संवैधानिक या वैधानिक आधार नहीं है।
पीठ, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा सौंपे गए दस्तावेजों और आकड़ों से संतुष्ट नहीं हुआ। न्यायालय ने 11 जून को मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह उन सामग्रियों को पेश करे, जिस आधार पर उसने आरक्षण में आरक्षण की व्यवस्था की थी।
न्यायालय का आदेश अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों के आईआईटी में प्रवेश को प्रभावित कर सकता है। क्योंकि इस वर्ष की संयुक्त प्रवेश परीक्षा के बाद आरक्षण में आरक्षण के तहत 325 उम्मीदवारों को काउंसिलिंग के लिए चयनित किया गया है।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के 28 मई के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने आरक्षण में आरक्षण की इस व्यवस्था को रद्द कर दिया था।
अल्पसंख्यक आरक्षण रद्द करने वाली उच्च न्यायालय की पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति पी.वी. संजय कुमार शामिल थे। पीठ ने घोषणा की थी कि केंद्र सरकार की यह कार्रवाई धार्मिक आधार पर थी, न कि अन्य किसी बौद्धिक आधार पर।
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