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अमित शाह का कड़ा रुख: “20 साल विपक्ष में रह लेंगे, लेकिन बाबरी मस्जिद बनाने वाले से हाथ नहीं मिलाएंगे”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बयान देकर टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर पर निशाना साधा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा को बंगाल में 20 साल तक विपक्ष में बैठना मंजूर है, लेकिन बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाने वाले व्यक्ति से कभी हाथ नहीं मिलाएंगे। यह बयान हुमायूं कबीर के साथ किसी संभावित समझौते की अटकलों के बीच आया है, जो भाजपा की राष्ट्रीय विचारधारा और हिंदुत्व के प्रति अटल प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। शाह का यह कठोर रुख बंगाल चुनावी रणनीति को प्रभावित करेगा।
हुमायूं कबीर, जो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के विधायक रह चुके हैं, हाल ही में पार्टी से निलंबित हो गए। 6 दिसंबर 2025 को उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले में बाबरी मस्जिद के निर्माण का शिलान्यास किया था, जो अयोध्या राम मंदिर के फैसले के ठीक विपरीत दिशा में एक उकसावेपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह घटना सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद हुई, जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा हो चुका था। हुमायूं का यह कार्य सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला था, जिसकी व्यापक निंदा हुई। भाजपा ने इसे वोटबैंक की राजनीति का हिस्सा बताते हुए टीएमसी पर हमला बोला। अब हुमायूं के भाजपा के साथ नजदीकी की खबरें उभर रही हैं, जिस पर अमित शाह ने साफ लकीर खींच दी है।
अमित शाह का बयान पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। बंगाल में भाजपा ने 2021 के चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन ममता बनर्जी की टीएमसी ने सत्ता बरकरार रखी। शाह ने बार-बार कहा है कि भाजपा बंगाल में हिंदू एकता को मजबूत करेगी और सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति का मुकाबला करेगी। हुमायूं जैसे व्यक्ति के साथ गठजोड़ की अफवाहें भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा कर रही थीं। शाह ने कहा, “हम 20 साल विपक्ष में बैठ जाएंगे, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करेंगे।” यह बयान भाजपा की रणनीति को स्पष्ट करता है कि सत्ता से अधिक वैचारिक शुद्धता महत्वपूर्ण है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे भाजपा का हिंदू वोटबैंक और मजबूत होगा।
यह विवाद बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को फिर से जीवंत कर रहा है। 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद लंबी कानूनी लड़ाई चली, जो 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समाप्त हुई। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण ने करोड़ों हिंदुओं को प्रसन्न किया, वहीं कुछ तत्वों द्वारा बाबरी मस्जिद निर्माण की मांग को उकसावे के रूप में देखा जाता है। हुमायूं कबीर का शिलान्यास इसी संदर्भ में विवादास्पद था, और अमित शाह का बयान भाजपा के उस रुख को दोहराता है जो राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा है। टीएमसी ने हुमायूं को निलंबित कर अपनी छवि संवारने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने इसे राजनीतिक ड्रामा करार दिया।
अमित शाह के इस बयान से बंगाल की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। भाजपा कार्यकर्ता इसे सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे कट्टरता का प्रमाण बताने की कोशिश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी बहस का केंद्र बनेगा। शाह का रुख न केवल हुमायूं कबीर को झटका देगा, बल्कि भाजपा को वैचारिक रूप से मजबूत बनाएगा। बंगाल में हिंदुत्व की लहर को देखते हुए यह बयान सही समय पर आया है, जो पार्टी की दृढ़ता को प्रदर्शित करता है।

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